पंडित जी पहुँच गए ब्लॉगर धाम में
॥ प्रविशि नगर कीजै सब काजा, हृदय राखि कौशलपुर राजा ॥
॥ श्री गणेशाय नमः ॥ ॥ सरस्वत्यै नमः ॥ ॥ महर्षि अगस्त्य विजयते ॥
॥ तुंगेश्वराय नमः ॥ ॥ जय बद्री विशाल ॥ ॥ जय बाबा केदारनाथ ॥
हे संतजनों, १५-१६ दिन की मेहनत के बाद पंडित जी ने आखिर ब्लॉगर धाम की राह पकड़ ही ली। वर्डप्रैस.कॉम वाली धर्मशाला को छोड़कर जाते हुए दुख तो बहुत हुआ, आखिर वहाँ रहकर ही इतनी इज्जत मिली, पहचान बनी, भक्त/शिष्य बने, इतने मित्र-प्यारे बने और तो और राजनीति में भी सितारा चमका, चुनाव के प्रथम चरण में जीत हासिल हुई। अनेक बार वर्डप्रैस.कॉम के हिन्दी चिट्ठों पर नंबर-१ पर रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। और भी कई सारी उपलब्धियाँ रही (मेरे हिसाब से)।
लेकिन समय पर किसका वश है, ये सच है कि वो मकान-मालिक काफी सुविधाएं देता था। काम करना बहुत आसान है वहाँ। घर भी खूबसूरत है। लेकिन साथ ही मकान-मालिक सख्त है, आजादी से कुछ करने ही नहीं देता। हमारा पूजा-पाठ भी ठीक से न हो पा रहा था और पाठशाला चलाने में भी दिक्कत आ रही थी। सो जाने का फैसला करना ही पड़ा।
कितनी मेहनत की थी उस घर को सजाने-संवारने में। घर के चप्पे-चप्पे से प्यार था। उस घर को छोड़ते हुए दिल बहुत ही उदास है। जमी-जमाई दुकान बदलने का दुख क्या होता है रविरतलामी जी से पूछो। खैर जाना तो था ही, फैसला अटल था।
बीच में एक बार द्वन्द में पड़ गया था कि ब्लॉगर सेठ के यहाँ किराए पर कमरा लूँ या फिर अपना प्लाट लेकर वर्डप्रैस मिस्त्री से मकान बनवा लूँ, लेकिन फिर मित्र गिरिराज जी के मंत्र ने दवाई का काम किया कि सिर्फ चिट्ठाकारी के लिए अपना प्लाट वगैरा लेने का काम मूर्खता होगी। बस फिर तो सब संशय दूर हो गया और झट से जाकर गूगल सेठ के बेटे ब्लॉगर बाबू से कमरा ले लिया। काफी दिन उसकी साफ-सफाई सजाने-संवारने में लगे। फिर दूसरी दिक्कत हुई पुरानी पोस्टों का क्या हो। इस बारे में सोचने में चार दिन लगे और कॉपी-पेस्ट करने में सिर्फ एक दिन। बीच में दो-तीन फिर से ब्रॉडबैंड कनेक्शन डाउन रहा।
इस दौरान ब्लॉगर भईया की भी अच्छाइयाँ-बुराइयाँ पता लग गई। खैर ऐसा कदम क्यों उठाया जरा तसल्ली से बताउँगा। अभी तो ये बताइए कि नया घर कैसा लग रहा है। और हाँ जाते-जाते लड्डू भी खाते जाइऐगा।
नीचे तस्वीर पर क्लिक करना लड्डू खाने जैसा है ![]()
लड्डू स्वाद हैं ना। खूब खाइए और दुआ कीजिए कि नए घर में पंडित जी खूब हिट हों। स्टैट काऊँटर घोड़े की तरह दौड़ता रहे और टिप्पणियों का प्रवाह रुके नहीं।
क्या कहा लड्डू का स्वाद जाना पहचाना लगा। दरअसल वो शुएब भाई के गृहप्रवेश के वक्त के बचे थे। जल्दी में उन्हीं को उठा लाया।
खैर ‘लड्डू खाने हैं कि पेड़ गिनने‘
और हाँ अपने बुकमार्क अपडेट करना न भूलिएगा।
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पंडित जी, नये घर के लिये बधाई!!!कितने कन्जूस हैं आप! इतने पुराने लड्डू खिला रहे हैं!
नए घर के लिए बधाई! आप और रवि जी मिलकर नए ब्लॉगर की इतनी तारीफ किए जा रहे हैं कि कभी-कभी मन में आता है कि अपने पुराने वीरान पड़े घर को फिर से आबाद करने निकल पडूँ। देखिए, कब मुहुर्त निकलता है!
नये घर में आपका स्वागत है। इसमें अब एक घरवाली और ले आइये।
मनीषा
hindibaat.blogspot.com
मुबारक हो!!!नवग्रह का पूजन करालें!!!
नया घर मुबारक हो , श्रीश भाई, लेकिन इतने पुराने लडडू खिलाने से अगर पाठकों को Gastric infection हो गया तो ?
आपने तो धूम-धाम व पूजा-पाठ करवा कर गृह-प्रवेश किया है. आपकी पाठशाला खुब चले हमारी शुभकामनाएं आपके साथ है.
चिट्ठा-आवरण को सज्जाने में आपने काफी महेनत की है.
“…नये घर में आपका स्वागत है। इसमें अब एक घरवाली और ले आइये।..”
मनीषा जी की बात का मैं समर्थन करता हूँ. ब्लॉगर के इस ब्लॉग को आपने बड़ी तकनीकी कुशलता से सजाया है. यह क्लिक रेट दर्शाने वाला कोड कहां से उठाया हमें भी बताएँ.
नए घर की बधाईयाँ! मेरा तो मानना है कि एक्सपेरीमेंट्स होते रहना चाहिए. एकरसता से बड़ा बोरियत कुछ भी नहीं.
नये घर की बधाई। रचना जी ने सही कहा बासी लड्डू पाठकॊं को खिला रहे हो, देखना कहीं मुँह खराब हो गया तो टिप्प्णीयाँ नहीं करेंगे।
और एक बात कम से कम यह तो बताते की यहाँ क्या है जो वर्ड प्रेस में नहीं है, मतलब दोनों पर तुलनात्मक लेख लिख मारिये अब।
भाई नया घर मुबारक हो।
घर चाहे वर्डप्रैस में हो या ब्लागर में, मुहल्ला तो नारद का ही रहेगा।
ह्म्म! अच्छा है, अच्छा है।
मिठाई असली होती तो मजा दोगुना होता। (हम अपनी च्वाइस बता देते है, हम तो ढोढा पसन्द करते है)
बहुत बहुत बधाई, थीम अच्छी लग रही है, पुरानी दुकान पर ताला लटका दो, बड़ा सा।
@ रचना,
रचना जी, हमारी ईमानदारी की तारीफ भी तो कीजिए कि सच-सच सब बता दिया। नहीं बताते तो आपको पता थोड़े ही चलता कि वही लड्डू हैं।
@ सृजन शिल्पी,
ब्लॉगर ‘वर्डप्रैस.कॉम’ से निसन्देह बेहतर है लेकिन होस्टिड ‘वर्डप्रैस’ से नहीं। इन दोनों में ‘वर्डप्रैस’ ही श्रेष्ठ है। अतः आप निश्चिंत रहें आप वर्तमान में सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगिंग टूल उपयोग कर रहे हैं।
@ मनीषा,
धन्यवाद ! मनीषा, सही समय पर यह काम भी होगा।
@ मन की बात,
ऊपर इतने बड़े-बड़े देवताओं का नाम ले तो लिया जी, अब क्या बाकी रह गया।
@ डॉ० प्रभात टंडन,
फिक्र नॉट, ऐसा कुछ हुआ तो आपके ऑनलाइन क्लीनिक पर भेज देंगे जी।
@ संजय बेंगाणी,
धन्यवाद आपकी शुभकामनाओं के लिए।
@ रविरतलामी,
शायद आप “3 Clicks Today (Updated Hourly)” वाले क्लिक रेट की बात कर रहे हैं। यह MyBlogLog के द्वारा संभव हुआ है।
@ सागर नाहर,
क्या बताऊँ इन दोनों की तुलना में ही मेरा पिछले सारे महीने दिमाग उलझा रहा, पूरा महीना इसी काम में निकला। विस्तार से तो बाद में लिखूँगा पर संझेप में जल्द ही बताता हूँ कि दोनों में मुख्य अंतर क्या हैं।
@ जगदीश भाटिया,
सही कहा भाटिया जी उनकी कृपा के बिना तो कुछ संभव नहीं।
@ जीतेन्द्र चौधरी,
भैया खूब सारे नोटिस बोर्ड तो लगा आया हूँ कि यह दुकान सामने वाली गली में चली गई है। ताले की जरुरत हुई तो वो भी देखेंगे, फिलहाल उधर टिप्पणियों पर ताला लगाने की सोच रहा हूँ ताकि सभी टिप्पणियाँ यहाँ आएं।
नये घर में आपका प्रवेश और उन्नती के पथ पर ले जाए…मुबारख्खो नया मकान लेकिन ज्यादा खुशी में सोये मत रह जाना अभी तो काफी काम बचा है…!!!
blogger to achachha hai hi, ye to mai pahale se janta hai. grih parivartan ki shubhkamnaye.
वाह भई, इंतजार की घड़ियां समाप्त हुई. स्वागत और नये घर में स्थापित होने के लिये बहुत मुबारक और बधाई. अब स्थगित लेखन पुनः जारी किया जाये. शुभकामनायें.
@ Divine India,
नहीं दिव्याभ भाई, सोएंगे नहीं बाकी काम भी निपटाते हैं।
@ प्रमेन्द्र प्रताप सिंह,
धन्यवाद और आपकी बात सच निकली।
@ उडन तश्तरी,
आपकी शुभकामनाओं के लिए धन्यवाद ! बस लेखन शुरु समझिए जी।
नए घर पर बधाई और शुभकामनाएँ। दुआ करता हूँ कि जल्द ही आपको पुनः बोरिया बिस्तर समेटना न पड़े क्योंकि उस तकलीफ़ को मैं भी समझता हूँ।
Badhaai.
hindi me kaise likhe? typing nahi aati hai, phir bhi koshish kiya hai. Ek line likha hai apne blog par.
kripya margdarshan karen.
हमारे लड्डू हमको ही वापस दे रहे हो
स्वागत है आपका
बहुत ख़ुशी हुई आपको http://epandit.shrish.in मे देखकर
अब भूले से भी वापस ना जाना, पहले जैसा हमारे साथ ख़ुशीयां बांटते रहना।