आइना दिखाते कंगारू
सोमवार २० नवम्बर, २००६ के दैनिक जागरण में पाठकनामा स्तंभ में एक पाठक का पत्र पढ़ा, जिस पर मेरे विचार से हम सब को गौर करना चाहिए।
हाल ही में ऑस्ट्रेलिया ने अपने देश में रह रहे मुस्लिम नागरिकों को यह स्पष्ट कर दिया कि अगर वे देश के कानून को नहीं मानते तो वह देश छोड़कर जा सकते हैं। यहाँ के प्रधानमंत्री ने मुसलमानों की एक सभा में कहा कि ऑस्ट्रेलिया एक लोकतांत्रिक और सेक्युलर देश है। यहाँ सारे कानून संसद वनाती है और देश में एक ही कानून चलेगा, यदि कोई संसद से स्वीकृत कानून के अतिरिक्त शरिया कानून मानता है तो वह देश छोड़कर वहाँ जाकर रह सकता है जहाँ शरियत कानून चलता है। यह देश उन्हीं के लिए है जो यहाँ का कानून मानता हो। भारत को इससे सबक लेना चाहिए। जहाँ धर्मनिरपेक्षता के नाम तुष्टीकरण की नीति चलायी जाती है। वोट बैंक के लालच में आतंकवादियों तक को सहयोग, सहायता, समर्थन व संरक्षण दिया जाता है।
मधु पोद्दार, पटेल नगर, गाजियाबाद
लेखक ने बिल्कुल सही बात कही है, सरदार पटेल ने भी पाकिस्तान परस्त मुस्लिमों को कहा था कि अगर उन्हें पाकिस्तान से ही प्यार है तो वे वहाँ जाकर रहने के लिए स्वतंत्र हैं। भारत में रहने वाले सभी मुस्लिमों और हमारा खून एक ही है, परंतु फिर भी जो हमें अपना नहीं मानते, हमारे कानून नहीं मानते, हमारा खून बहाते हैं उन्हें हमने कहाँ पकड़ रखा है वे अपने पसंद के देश क्यों नहीं चले जाते।






















मैं इन विचारों के साथ प्रस्तर युग में जाने को तैयार हूँ. (यह व्यंग्य नहीं बक्लि अपने विचारों के प्रति दृठता है अतः देबूदा बुरा न माने)
मै सहमत हुँ कि देश में कोमन सिविल कोड होना चाहिए
बिलकुल सही बात है पंिडत जी और भारत मे भी एक कानुन बनना चाहिये की अगर किसी ने वंदे-मातरम का विरोध किया तो उसकी भारतिय नागरिकता छीन लेनी चाहिये.
एकदम सच्ची बात है। देश का कानून ही सर्वोपरि होना चाहिए ।
बहुत उत्तम विचार है, सच है जो देश के नियमों को नहीं मानता उसे देश में रहने का कोई अधिकार नहीं।
साहिल जी ने कहा “किसी ने वंदे-मातरम का विरोध किया तो उसकी भारतिय नागरिकता छीन लेनी चाहिये.” यह नियम उन लोगों पर भी लागू होना चाहिये जो हिन्दी का विरोध करते हैं, उदाहरण के लिये : जयललिता।
जी हाँ यदि कोई इस देश में जन्म लेकर इसकी स्तुति नहीं कर सकता तो उसको इस देश में रहने का हक नहीं। यह वैसे ही जैसे कोई जन्मदायिनी माँ का दूध पिये, उसकी गोद में खेलकूद कर बड़ा हो और फिर उस को माँ कहने से इन्कार करे। यह सरासर उस माँ का अपमान है।
मुझे लगता है, टिप्पणियाँ मुद्दे से हट कर की जा रही है. देश में ऐसा कोई कानुन नहीं है की कोई ‘वन्दे मातरम’ गाने से इंकार न कर सके.
यहाँ बात सबके लिए एक समान कानुन की हो रही है.
@ संजय बेंगाणी,
कानून तो ऐसा भी नहीं कि हम अपने माँ-बाप की इज्जत करें, उनके पैर छुएं पर हम करते हैं ना, दिक्कत यही तो है आप लोग ‘वंदे मातरम’ को हिंदुत्व से जोड़कर क्यों देखते हैं। अगर यही गीत उर्दू में होता तो आप लोग ऐसा न कहते। अगर हम लोग ‘सारे जहाँ से अच्छा’ गर्व से गा सकते हैं तो दूसरे लोग ‘वंदे मातरम’ क्यों नहीं।
श्रीशजी ‘आपलोग-आपलोग’ लिखने से पहले यह पढ़ ले-
http://www.tarakash.com/joglikhi/?p=71
@ पंकज बेंग़ाणी,
आपलोग से मेरा मतलब छद्म सेकुलरवादियों से था। खैर ‘वंदे मातरम’ संबंधी बहस तो ३-४ महीने पहले बहुत हो चुकी। वह तो इस पोस्ट का विषय भी नहीं था।
भारत में यूनीफार्म सिविल कोड बहुत आवश्यक है। वर्तमान कोड हमें ब्रिटिश विरासत से मिला है। पाकिस्तान का यूनीफार्म कोड शरिया है किन्तु इसके माने यह नहीं है कि हमारा यूनीफार्म कोड मनुस्मृति हो। भारत की सभी जाति, धर्म और समाजों का प्रतिनिधित्व करता हुआ एक आयोग स्थापित होना चाहिये जो इस समस्या का समाधान ढ़ूढ़े। गालियाँ देने से समस्या हल नहीं होगी।
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