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ऑरकुट की तीसरी वर्षगांठ तथा मेरा ऑरकुटियाना


Orkut’s Third Birth Day, I am love’ in it.

आज ऑरकुट पर गया तो पता चला कि ३० जनवरी को ऑरकुट का तीसरा जन्मदिन था। ऑरकुट भी अधिकतर गूगल सेवाओं की तरह गूगलदेव का दत्तक-पुत्र है। यह काफी पहले की बात है जब ऑरकुट ज्वाइन किया था। सोशल-नेटवर्किंग शब्द अक्सर सुनता तो था पर जानता न था कि क्या बला होती है। उन दिनों ऑरकुट ज्वाइन करने के लिए इन्विटेशन की जरुरत होती थी। तो एक बार एक इंग्लिश ब्लॉग पर Ryan Wagner महोदय हर टिप्पणीकर्ता को इन्विटेशन भेज रहे थे। मैंने भी एक टिप्पणी की और भूल गया। कुछ समय बाद उनकी इन्विटेशन आई तो ज्वाइन कर लिया और उनका धन्यवाद कर दिया, अपने ब्लॉग के About पेज पर उसका बैज लगा दिया। ऑरकुट पर गया तो कुछ खास समझ न आया कि चक्कर क्या है। मुझे लगा ये भी उन बकवास डेटिंग साइटों जैसी ही चीज है। दुबारा उधर कभी गया ही नहीं।

इस दौरान अन्य गूगल सेवाओं की तरह ऑरकुट भी गूगल-अकाऊंट से जुड़ गया। मेरा एक मित्र दिनेश अक्सर ऑरकुट की बात करता था तो मैंने आजमाने की सोची पर ऑरकुट के होमपेज पर जाने पर लॉगइन बॉक्स दिखता ही नहीं था। बहुत दिन परेशान होकर मैंने ट्राई करना ही छोड़ दिया। काफी बाद में पता चला कि ऐसा एक गूगल से संबंधित ग्रीजमॉन्की यूजरस्क्रिप्ट के कारण था। उसे अनइंस्टाल करने पर सब ठीक हो गया।

फिर एक दिन मेल प्राप्त हुई कि डॉक्टर प्रभात टंडन ने मुझे अपने ऑरकुट कॉन्टेक्ट में जोड़ लिया है। इधर दिनेश भी अक्सर तारीफ करता रहता था तो मैं भी इस बारे में उत्सुक था। ऑरकुट पर गया तो थोड़ा झक मारना शुरु किया ये स्क्रैपबुक क्या होती है। कम्युनिटी का थोड़ा आइडिया तो दिनेश की बातों से लगा था कि अक्सर स्कूल-कॉलेज वगैरा की होती हैं। लेकिन जैसे-जैसे प्रयोग करता गया मजा आने लगा।

फिर एक दिन जी में आया कि अपने पुराने दोस्तों को ढूंढा जाए शायद कोई मिले। तो पहले सोचा कि कौन-कौन से दोस्त आज कम्प्यूटर के क्षेत्र से जुड़े हैं/रहे हैं और उनमें से कौन से आज इंटरनेट का प्रयोग करते हो सकते हैं, तो कुछ दोस्त ढूंढे। उदाहरण के लिए एक ग्रेज्युएशन का दोस्त है हरीश रावत। पहले सर्च टर्म प्रयोग की – ‘Harish Rawat’ तो ३०-४० हरीश रावत मिल गए। फिर सर्च टर्म ली – ‘Harish Rawat Yamunanagar’ पर बंदा नहीं मिला जी, फिर सोचा कि कुछ लोग ‘Yamunanagar’ लिखते हैं और कुछ ‘Yamuna Nagar’. अब सर्च टर्म ली – ‘Harish Rawat Yamuna’ तो मिल गया जी एक बंदा। अब उसकी कम्युनिटी देखी – HEC (Haryana Engineering College) और Saraswati Vidya Mandir Schoolतो पक्का हो गया कि वही है फिर भी अंतिम पड़ताल के तौर पर स्क्रैप लिख कर पूछ लिया तो जवाब आया वही हूँ भाई। बस फिर तो कुछ और दोस्त मिल गए। इतने दिनों बाद पुराने मित्रों से बात करके बड़ा आनन्द आया।

फिर मैंने कम्युनिटीज खोजनी शुरु की यमुनानगर की खोज निकाली, हरियाणा, उतरांचल की तो कई सारी हैं। सुना था कि भुवनेश भाई ऑरकुट पर हिन्दी जगत में काफी सक्रिय रहते हैं, इसलिए उनसे मेल द्वारा पूछा कि क्या कोई चिट्ठाकार कम्युनिटी भी है पर कोई जवाब नहीं आया। :(

अपने Khalsa College, Yamuna Nagar की भी मिली। अपने बीएड कॉलेज सोहनलाल कॉलेज डीएवी कॉलेज ऑफ ऐजुकेशन की उम्मीद नहीं थी क्योंकि बीएड में कम्प्यूटर सांईस वाले कम ही आते थे। खैर सर्च टर्म प्रयोग की – ‘Sohan Lal DAV College of Education, Ambala City‘. कुछ नहीं मिला फिर खाली ‘Ambala’ के नाम से ढूंढा पर बहुत रिजल्ट थे देखते-देखते थक गया तो सोचा नहीं होगी। एक दो दिन बाद दुबारा कोशिश की – ‘Sohan Lal’ बस और मिल गई। च च सिर्फ सात मेंबर थे। उत्तर भारत के सबसे पुराने और सर्वश्रेष्ठ टीचर ट्रेनिंग कॉलेज से सिर्फ सात मेंबर। कारण वही कि कम्प्यूटर वाले छात्र अधिकतर टीचिंग में नहीं आते। ज्वाइन की पर शिथिल है खैर कुछ न होने से…,

अपने Govt. Model Sr. Sec. School, Jagadhri स्कूल की उम्मीद न थी कि होगा वहाँ यद्यपि उस समय तो वह जगाधरी का टॉप स्कूल था जो कि मॉडल घोषित हुआ था। तो जी एक कम्युनिटी बना डाली, सर्च द्वारा दो-तीन बंदों का पता लगाया जो वहाँ पढ़े थे उन सबको इन्विटेशन दे आया। अभी तो अकेला ही झंडा गाड़े बैठा हूँ कभी तो कोई आएगा।

अब मुझे समझ आ ही गया था कि बस खोजो और पाओ। पहले ‘Uttaranchal‘, फिर ‘Rudraprayag‘ खोजा। अंत में सोचा पता किया जाए कोई अपने गांव वाला भी इधर है। अपने गांव का नाम है ‘बेंजी’। तो सर्च टर्म इस्तेमाल की – ‘Benji’. अब जैसा मुझे शक था ढेरों रिजल्ट मिले पर सब Benji नामक इंग्लिश फिल्म के बारे में। इससे पहले गूगल तथा फ्लिकर पर भी सर्च में ऐसा हो चुका था। पहले सोचा हमारी तरफ अभी इंटरनेट आदि का इतना प्रचार नहीं, पर बाहर भी तो रहते हैं कई लोग।

फिर बेंजवाल उपनाम (Surname) से खोजने की सूझी जो हमारे गांव वाले लगाते हैं। सर्च टर्म – Benjwal, लो जी तीस-बतीस बेंजवाल मिल गए। अब गढ़वाल में हमारे गांव के अलावा सिर्फ एक गांव में ही कुछ ‘बेंजवाल’ होते हैं। अपने प्रोफाइल में सिर्फ एक-दो बंदो ने ही गांव और जिले आदि का नाम मेन्शन कर रखा था। इसी दौरान एक भाईसाहब अपने मुझे ट्रैक करते हुए पहुंच गए (मेरे विचार से अपने प्रोफाइल में Recent Visitors द्वारा)। बस फिर तो एक-एक कर कई लोग मिल गए और मिलते जा रहे हैं। लगे हाथ मैंने गांव वालों की एक-कम्युनिटी बना ली है – Village – Benji, ग्राम – बेंजी, प्रचार में लगा हूँ। अभी सात सदस्य जुड़े हैं वक्त लगेगा पर कभी तो सब आएंगे।

फिर चिट्ठाकार समुदाय, हिन्दी समुदाय आदि अनेक कम्युनिटी मिल गईं। एक दिन खुरापात सूझी की मेरा नाम अक्सर कम लोगों का होता है, तो खोज की – ‘Shrish’. कई लोग थे इस नाम से पर जो कमाल की चीज मिली एक कम्युनिटी – The World of SHRISH. जो कि Rare नाम ‘श्रीश’ वाले लोगों के लिए है। मुझे कम्युनिटी बनाने वाले की तारीफ करनी पड़ेगी, इस नाम की एक लंबी कहानी होती है जो कि कभी फुरसत से लिखूँगा।

आज मुझे लगता है कई लोग हमारे नेटवर्क में हो सकते हैं। लेकिन उन्होंने वो चीजें मेन्शन नहीं कर रखी जिनके बेस पे खोजा जा सके। अतः मेरे विचार से यह बहुत महत्वपूर्ण है कि अपने प्रोफाइल में सभी चीजें मेन्शन की जाएं। इसके अतिरिक्त कम्युनिटी बनाते वक्त खास ध्यान रखा जाए कि उसका नाम, डिस्क्रिप्शन आदि ऐसा हो जो आसानी से सर्च रिजल्टस में आ जाए। एक बात और जो मुझे चुभी कि बिल्कुल एक ही विषय और संस्था आदि पर लोग ढेरों कम्युनिटीज बना डालते हैं। बजाए नई-नई कम्युनिटीज बनाने के चाहिए कि सर्च कर के मौजूदा में ही शामिल हुआ जाए तथा उन्हें ही समृद्ध बनाया जाए।

कभी मुझे लगता था कि लोग पता नहीं क्या लगे रहते हैं ऑरकुट पर अब समझ आया। प्रभात जी का मुझे ऑरकुट की दुनिया में लाने के लिए फिर से शुक्रिया।

बोलो गूगल-पुत्र ऑरकुट देव की जय !

इस अवसर पर ऑरकुट देव की एक आरती जो एक स्क्रैपबुक में मिली लिखना सार्थक होगा।

औरकुटिंग बिना चैन कहां रे…
स्करैपिंग बिना चैन कहां रे…
सोना नहीं चांदी नहीं,औरकुट तो मिला
अरे औरकुटिंग कर ले….

…अल्ताफ राजा शैली:

तुम तो ठहरे औरकुटवाले..
साथ क्या निभाओगे…
सुबह पहले..
सुबह पहले मौके पे
नेट पे बैठ जाओगे…

तुम तो ठहरे औरकुटवाले…
साथ क्या निभाओगे..

…जॉनी वॉकर माफ़िक:

जब सर पे ख्याल मंडराएं,
और बिल्कुल रहा ना जाए..
आजा प्यारे औरकुट के द्वारे,
काहे घबराए… काहे घबराए…

सुन सुन सुन, अरे बाबा सुन
इस औरकुटिंग के बड़े बड़े गुन
हर औरकुटर बन गया है पंडित
गूगल भी थर्राए…
काहे घबराए… काहे घबराए

अपुन इधर है:

मेरा ऑरकुट प्रोफाइल

ब्लोगिए इधर बैठे हैं:

चिप्पियाँ:




7 टिप्पणियाँ

  1. बहुत सही लिखे हो…हम भी अभी ऑरकिटियाना शुरु किये है हमें ज्वाईन करो भाई…जरा संपर्क सूत्र में विस्तार होगा… समीर लाल के नाम से ही वहां हूँ:) है तो चीज गजब की.

  2. हम ऑरकूट पर हैं तो सही मगर निश्क्रिय ही हैं, हजार झमेलो में एक और काहे गले बाँधे. मगर चीज है काम की, अगर नशा न बन जाए तो.

  3. हम भी बहुत बुजुर्ग लोगों मे से है वहाँ पर। शायद तब से जब कोई आरकुट के बारे मे जानता नही था।

    ह्म्म, है तो सही चीज, लेकिन इसको जितना प्रयोग ब्राजीलियन ने किया उतना हम भारतीय नही कर सके। मैने देखा लोग आरकुट का प्रयोग भारत विरोधी मंचों की तरह करने लगे थे, इसलिए मैने फिर ज्यादा जाना छोड़ दिया। अब भी गाहे बगाहे जाता हूँ, लेकिन सबसे निवेदन है कि अपनी बहुत ही व्यक्तिगत जानकारी आर्कुट पर मत डालें, कुछ रिपोर्ट्स आयी थी, कि इससे रिलेटेड भी कुछ क्राइम्स हुए है। ध्यान रखिएगा।

  4. हाँ जीतू भाई, यह बात तो सही है कि आरकुट का प्रयोग भारत विरोधी गतिविधियों मे अक्सर होता रहता है लेकिन फ़िर भी आरकुट का योगदान भूले बिछडे लोगों को मिलाने के लिये वरदान ही है।

  5. @ उडन तश्तरी,
    समीर जी, आपकी टिप्पणी करने से पहले ही हम सुबह आप को जोड़ लिए थे।

    @ संजय,
    काम की तो है ही जी, सालों पुराने दोस्त मिल गए वहाँ, और की चाईदा है।

    @ जीतू,
    ये ब्राजीलियन ने क्या प्रयोग किया है जी ?

    अब अगर कोई इसे भारत विरोधी मंच की तरह प्रयोग करे तो इसमें ऑरकुट का तो दोष नहीं। हम भी अगर कोई विरोधी मंच बनाएं तो वो हमें भी थोड़ी न रोकेगा। और ऐसा तो हर जगह किया जा सकता है गूगल ग्रुप्स में भी तो क्या उनका प्रयोग छोड़ देंगे।

    व्यक्तिगत जानकारी का कुछ अंदाजा बताएंगे। नाम, शहर का नाम आदि तो डाला ही है, क्या न डालें इस बारे में राय दीजिए।

    @ डॉ० प्रभात,
    सही है जी, मैं तो इस बारे में बता ही चुका हूँ।

  6. बड़ी सही कविता कह डाली…आंरकूट का प्रभाव दिख रहा है…लगे रहो पंडित जी…।

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