चार दिन की ऑफलाइन कैद
यह होली से अगले दिन की बात है। सुबह सुबह नेट चलाया तो पता चला कि नेट डाउन है। तो भैया पहले तो सोचा कि फिर से इंटरनेट ठप हो गया लेकिन फिर पता चला कि टेलीफोन डेड है। पड़ोस में कम्पलेन लिखवाने गया तो पता चला कि उनका भी फोन डेड है। फिर दूसरे घर में गया तो वहाँ भी, श्याम तक पता चला कि पूरे मोहल्ले के फोन डेड हैं। फिर पता चला कि पूरे क्षेत्र के फोन डेड हैं। अगले दिन पता लगा कि चोर इंडस्ट्रियल एरिया से जमीन खोद टेलीफोन की केबल चुरा ले गए। तो भईया कुल मिलाकर चार दिन फोन डेड रहा और स्वाभाविक है इंटरनेट भी ठप्प। पहला दिन तो बड़ा मुश्किल बीता। फिर लगा अब तो हफ्ते वगैरा का काम हो गया यह। खैर चार दिन बाद जाकर ऑनलाइन होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
आकर चिट्ठाजगत की खबर ली तो सबसे पहले शुभ समाचार मिला कि ब्लॉगर में अब हिन्दी में लिखने का फोनेटिक जुगाड़ आ गया है। दिल खुश हो गया जानकर, जल्द ही इसको टैस्ट कर समीक्षा लिखूँगा। लेकिन इतना तय है कि ये एक बहुत ही सुखद कार्य हुआ। अब हिन्दी में ब्लॉग लिखना और भी सरल हो गया और नए बन्दों के लिए तो और आसानी हो गई।
मोहल्ला दंगल भी देखने पढ़ने को मिला जानकर दुख हुआ। इस विषय में यही कहूँगा कि भाई अपनी ऊर्जा को रचनात्मक कार्यों में लगाइए। अभी नेट पर हिन्दी का विकास ही हो रहा है, उसमें अपना योगदान दीजिए। ये लड़ने झगड़ने का काम आगे वाले समय पर छोड़ दीजिए। अभी हिन्दी की दुनिया इतनी बड़ी नहीं हुई कि हम आपस में ही लड़ें। खैर !
हाँ एक बात देखकर बहुत खुशी हुई कि ऑफलाइन जाने से पहले मैंने एक प्रयोग के तहत कई लोगों को नारद और परिचर्चा का रास्ता दिखाया था। उनमें से बहुत लोग दिख रहे हैं, इस बारे में विस्तार से फिर लिखूँगा।
खैर एक बात तो है कि पिछली बार तीन दिन की कैद लगी थी इस बार तरक्की होकर चार दिन। अगली बार कहीं…






















चार दिन की चॉंदनी फिर अँधेरी रात…..
स्वागत है, फिर से
अरे, बड़ा अच्छा लगा वापस देखकर. हम तो घबरा ही गये थे कि हमारे पंड़ित जी कहाँ खो गये.
अब न जाना भाई बिना बताये.
भगवान करे जल्दी से पूरा भारत Wi-Fi हो जाये और हमें तारों के भरोसे ही न रहना पड़े
कित्ते भले चोर हैं. आदमी को आराम भी तो लेना चाहिये. न ले तो बेचारे चोर मदद कर रहे हैं तो क्य बुरा है?
ब्लॉगर का हिन्दी ट्रांसलिटरेशन थर्ड क्लास है. अभी उन्हे और निखारना होगा. बड़ा स्लो है.
कभी-कभी इस प्रकार का आराम सुखदायी होता है, बशर्ते कि कोई अत्यावश्यक कार्य इससे न प्रभावित होता हो। फोन तो कभी कभी खराब हो ही जाते हैं परंतु एक-दो बार उत्तरांचल के सुदूर अंचलों यात्रा के समय ऐसा ही हुआ – नेट से दूर और कुछ एक स्थान पर तो मोबाईल से दूर क्या बिजली, शहर कस्बा और बस्ती और इस प्रकार की तमाम सुविधाओं से भी दूर 1-2 दिन बिताए। बहुत आनन्द भी आता है कभी कभी ऐसे में।
@मसिजीवी,
सही कहा जी, कुछ नहीं पता कब ऑफलाइन हो जाएं फिर से।
@उड़नतश्तरी,
बताकर जाने का मौका कहाँ मिलता है जी। फिर जाना कौन कम्बख्त चाहता है।
@जगदीश भाटीया,
जगदीश भाई मैं खुद भी इसी प्रतीक्षा में हूँ, आमीन !
@ज्ञानदत्त पाण्डेय,
पांडे जी, आपकी बात भी खैर सही है।
ब्लॉगर के हिन्दी ट्रांसलिटरेशन के स्लो होने का कारण है कि ये इसके लिए सर्वर पर आधारित है, अतः ऐसा है।
@राजीव,
आपकी बात सही है, सच कहूँ तो दो दिन तसल्ली से आराम कर पाया, वरना तो पूरा दिन इस ब्लॉग में ही निकल जाता है।
बाकी बचपन में कुछ साल उत्तरांचल में ही गुजरे हैं, फोन टीवी तो तब थे ही नहीं बिजली थी तो पर अक्सर गुल हो जाती थी। आपके बताए हालातों में रहा हुआ हूँ। खैर अब तो हालात बदल गए। फोन टीवी तो पुराने हुए अब मोबाइल तक पहाड़ पर पहुँच गया है हाँ सब जगह सिग्नल नहीं पकड़ता। कई जगह गांवो में (शहरों में तो खैर है ही) मोबाइल के द्वारा नेट भी प्रयोग हो रहा है।
कैदी का पुन: स्वागत है।