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नॉन-यूनिकोड प्रोग्राम – हिन्दी कंप्यूटिंग के मार्ग की दूसरी प्रमुख बाधा


Non-Unicode programs – Second main hurdle in path of Hindi Computing

पिछली पोस्ट में मैंने हिन्दी के मार्ग की एक प्रमुख बाधा के रुप में विंडोज 98/ME की चर्चा की थी, इस पोस्ट में दूसरी प्रमुख बाधा नॉन-यूनिकोड प्रोग्रामों की चर्चा कर रहा हूँ।

हम सब जानते हैं कि यूनिकोड के प्रचलन में आने से पहले एक समय ऐसा भी था जब हिन्दी में टाइप करने के लिए रेमिंगटन टाइपिंग जानना आवश्यक था, फिर यूनिकोड आया लेकिन शुरुआत में केवल इसमें इनस्क्रिप्ट लेआउट में ही टाइपिंग होती थी। फिर आए फोनेटिक (ट्रांसलिट्रेशन) औजार जिन्होंने हिन्दी टाइपिंग को जन-जन तक पहुँचा दिया। बाद में बैकवर्ड कंपैटिब्लिटी के तौर पर रेमिंगटन लेआउट आधारित कीबोर्ड भी यूनिकोड औजारों में शामिल हो गए ताकि पुराने टाइपिस्टों को दिक्कत न हो।

यूनिकोड की एक सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह सबको अपनी पसंद की टाइपिंग विधि के प्रयोग की आजादी देता है। लगभग सभी टाइपिंग विधियों के लिए यूनिकोड टाइपिंग औजार बनाए जा चुके हैं।

यूनिकोड के आगमन के बाद से बहुत से सॉफ्टवेयरों, साइटों तथा ऑनलाइन सेवाओं का यूनिकोडकरण शुरु हुआ। आज इनमें से अधिकतर यूनिकोड सक्षम हैं लेकिन अब भी अक्सर ऐसा होता है कि हम कोई सॉफ्टवेयर या ऑनलाइन सेवा में हिन्दी टाइप करने लगते हैं तो डब्बे या प्रश्नचिन्ह नजर आने लगते हैं अर्थात वह यूनिकोड का समर्थन नहीं करता।

अब इनमें से कई जगह तो फिर हिन्दी में टाइप करना असंभव ही हो जाता है लेकिन जहाँ पर फॉन्ट बदलने की सुविधा है वहाँ नॉन-यूनिकोड फॉन्ट जैसे कृतिदेव आदि चुनकर हिन्दी टाइप की जा सकती है। यद्यपि इससे वह बात नहीं बनती जो यूनिकोड में है, इसमें डाटा-प्रोसैसिंग जैसे सर्चिंग-सॉर्टिंग आदि नहीं की जा सकती।

इस तरह के प्रोग्राम कई हैं जो यूनिकोड का समर्थन नहीं करते उदाहरण के लिए बहुत से ग्राफिक्स प्रोग्राम, डीटीपी पैकेज आदि। वैसे तो बहुत सी चीजें हैं जो यूनिकोड सपोर्ट नहीं करती, उनके लिए हम सबस्टीच्यूट प्रोग्राम/सेवा का प्रयोग कर लेते हैं लेकिन कुछ प्रोग्राम ऐसे हैं जिनके लिए विकल्प मिलना मुश्किल है जो कि उन्हीं जितनी क्षमता से काम कर सके। उदाहरण के लिए: फोटोशॉप और पेजमेकर। इन दोनों का विशेष उल्लेख करने का कारण ये है कि ग्राफिक्स और डीटीपी के क्षेत्र में ये दोनों सॉफ्टवेयर सर्वाधिक प्रयोग किए जाते हैं बल्कि अगर यह कहें कि वर्तमान में इन दोनों के बिना इन क्षेत्रों की कल्पना ही नहीं की जा सकती, तो ये गलत न होगा। बाकी दुनिया को छोड़ भी दें तो हमारे भारत में इनका घर से लेकर ऑफिस, दुकानों, कंपनियों और मीडिया तक इनका प्रसार है। ग्राफिक्स का सब जगह काम मुख्यतः फोटोशॉप और कोरल ड्रा में होता है जबकि डीटीपी का पेजमेकर और क्वार्क एक्सप्रैस में। छोटे मोटे काम के लिए तो विकल्पों का प्रयोग किया जा सकता है पर प्रोफैशनल स्तर पर कार्य के लिए इनके विकल्प नहीं।

इन दोनों सॉफ्टवेयरों को एडोब बनाती है। पता नहीं इन एडोब वालों को यूनिकोड से क्या दुश्मनी है। यह हाल तब है जबकि फोटोशॉप की डेवलपर टीम में कई भारतीय हैं।

अब बाकी जगह आदमी भले ही अंग्रेजी से काम चला लें लेकिन ग्राफिक्स और डीटीपी में हिन्दी बिना काम नहीं चल सकता (ऐसा मेरे विद्यालय के डीटीपी ऑपरेटर जो कि काफी समय से डीटीपी/ग्राफिक्स का काम करते हैं, ने कहा)। अब ये प्रोग्राम यूनिकोड का समर्थन तो करते नहीं तो इनमें हिन्दी टाइप करने के लिए रेमिंगटन टाइपिंग का ही उपयोग होता है। अब रेमिंगटन के जानकार सिर्फ पुराने लोग हैं (कुछ अपवाद छोड़कर) जिस वजह से अधिकतर लोग इनमें हिन्दी टाइप नहीं कर पाते। ग्राफिक्स में तो फिर भी थोड़ा काम होता है जिससे कि कीमैप देखकर काम चलाया जा सकता है (जैसे बेंगाणी बंधु करते हैं) लेकिन डीटीपी में रेमिंगटन आनी जरुरी है।

अब पहले तो वैसे ही आम कंप्यूटर उपयोगकर्ता को यूनिकोड का पता होता नहीं, आज भी हिन्दी टाइपिंग के बारे में एक आम कंप्यूटर उपयोक्ता को यही मालूम है कि इसके लिए पहले हिन्दी की टाइपिंग (रेमिंगटन) सीखनी होती है। फोनेटिक तथा इनस्क्रिप्ट प्रणालियों के बारे में बहुत ही कम लोगों को पता है (मेरे अनुमान से पूरी दुनिया में लगभग केवल १००० लोगों को, जिनमें से ५०० तो लगभग हिन्दी चिट्ठाकार हैं और बाकी के हिन्दी/इंडिक कंप्यूटिंग से जुड़े़ लोग)। इस कारण से यदि कोई व्यक्ति ग्राफिक्स/डीटीपी क्षेत्रों में कार्य करने जाता है तो उसे मजबूरन आउटडेटेड हो चुकी रेमिंगटन टाइपिंग सीखनी पड़ती है जबकि फोनेटिक तथा इनस्क्रिप्ट सीखना इसकी तुलना में बहुत आसान है। यह एक मुख्य कारण है जिससे कि लोगों को भ्रम है कि हिन्दी में काम करना मुश्किल है।

एक आम हिन्दी प्रयोक्ता क्या कर सकता है?

» सभी अयूनिकोडित प्रोग्रामों के विकल्पों का उपयोग किया जाए जो कि यूनिकोड समर्थित हैं। परंतु इसमें फिर वही दिक्कत है कि कुछ प्रोग्रामों के लिए उन जितने सक्षम सब्स्टीच्यूट नहीं हैं।

» सभी हिन्दी प्रयोक्ता एडोब वालों को उनकी फोरम, संपर्क-सूत्रों आदि सभी साधनों द्वारा अनुरोध करें कि फोटोशॉप, पेजमेकर आदि में यूनिकोड समर्थन सक्षम किया जाए। वर्तमान में इन दोनों के आने वाले संस्करणों के बीटा संस्करण जारी हैं, हम सब को चाहिए कि एडोब वालों तक अपनी बात पहुचाएँ ताकि नए संस्करणों में यूनिकोड का समर्थन हो सके। विशेषकर इनकी डेवलपर टीम के जो भारतीय सदस्य हैं उनको इस बात से अवगत कराया जाना चाहिए कि इन उत्पादों में यूनिकोड समर्थन आने से भारतीय भाषाओं को कितना भला होगा। साथ ही इससे भारत में एडोब का बाजार भी बढ़ेगा।

वर्तमान में इस समस्या का क्या हल उपलब्ध है?

कुछ ही समय पूर्व सृजनशिल्पी जी से इस बारे एक दिन बात हुई। अब वो तो जिद पर अड़ गए कि भाई पेजमेकर वगैरह में इनस्क्रिप्ट, फोनेटिक आदि हेतु टाइपिंग लेआउट होता है। मैंने कहा कि मुझे तो कोई ऐसा विकल्प कभी दिखा नहीं, साथ ही होता तो सब हिन्दी वाले साथियों को पता न होता क्या। खैर उनसे काफी देर बात हुई तो मालूम पड़ा कि इस काम के लिए ISM नामक औजार होता है। वो मुझे ठीक से समझा न सके कि यह होता क्या है, तब मैंने गूगलदेव की मदद से काफी सर्च किया तो सीडैक की साइट तथा एक-दो अन्य जगहों पर इस बारे जानकारी मिली जिसकी मदद से मैंने ये लेख लिखा। ISM एक तरह का इंटरफेस है जो इन प्रोग्रामों के लिए IME (इनपुट मैथड एडीटर) की भांति कार्य करता है।

अब दिक्कत ये है कि ये मुफ्त सॉफ्टवेयर नहीं, इसलिए आम आदमी के बस में इसे खरीदना नहीं है। इसका कोई ट्रायल तक उपलब्ध नहीं जिससे कि कोई इसका परीक्षण कर इसे लेने के बारे में विचार कर सके। इसके अलावा ये केवल कुछ चुनिंदा सॉफ्टवेयरों पर ही काम करता है। इन वजहों से ये उपरोक्त समस्या का समाधान नहीं हो सकता।

फोनेटिक टाइपिंग वालों के लिए एक तरीका है बरहा डायरैक्ट में नॉन-यूनिकोड टाइपिंग द्वारा। बरहा में अयूनिकोडित टाइपिंग के लिए BRH-Devanagari नामक नॉन-यूनिकोड फॉन्ट होता है। इसके प्रयोग से टाइपिंग की जानकारी इस लेख में दी गई है। परंतु इसमें केवल एक ही फॉन्ट का प्रयोग किया जा सकता है।

एक अन्य टूल है सीडैक का GIST-TT Typing Tool इसमें तीनों लेआउट उपलब्ध हैं – फोनेटिक, इनस्क्रिप्ट तथा रेमिंगटन। यह एक नॉन-यूनिकोड इनपुट मैथड एडीटर है। इसमें चार फॉन्ट उपलब्ध हैं लेकिन वो सब बिल्कुल बेकार से हैं और डीटीपी जैसे कामों के लिए उपयुक्त नहीं।

तो एक बात तो तय है कि जो भी अयूनिकोडित इनपुट मैथड एडीटर होगा, वो सब नॉन-यूनिकोड फॉन्टों के साथ कार्य नहीं कर सकता, बल्कि केवल अपने ही कुछ विशिष्ट फॉन्टों के साथ करेगा।

अब डैवलपर इस दिशा में कुछ कार्य कर सकते हैं

बहुत पहले मैं सोचता था कि फोनेटिक तथा इनस्क्रिप्ट लेआउट के लिए नॉन-यूनिकोड फॉन्ट बनाए जाएँ लेकिन बाद में समझ आया कि यह संभव नहीं क्योंकि इनमें मात्राएँ तथा संयुक्ताक्षर आदि विभिन्न कुँजियों के संयोजन से बनते हैं। फोनेटिक तथा इनस्क्रिप्ट के लिए यह काम इनपुट मैथड एडीटर और विशेष फॉन्टों के संयोग से ही संभव है।

मेरा विचार है कि एक नॉन-यूनिकोड इनपुट मैथड एडीटर बनाया जाना चाहिए तथा उसके साथ काम करने के लिए अधिक से अधिक फॉन्ट भी। जहाँ तक मैं समझता हूँ यह कार्य पूर्ण रुप से संभव है क्योंकि बरहा डायरैक्ट और जिस्ट वाले उपरोक्त टूल का उदाहरण सामने है। इसके अतिरिक्त विनय जी ने एक दिन बातचीत में बताया कि पुराने स‌मय में जब यूनिकोड नहीं आया था तो नॉन-यूनिकोड फॉन्टों के लिए IME जैसे TSR टूल होते थे जो कि केवल फॉन्ट विशेष हेतु ही कार्य करते थे। कृतिदेव शायद पहला ऎसा फॉन्ट था जिससे बिना किसी TSR के सीधे ही टाइप कर स‌कते थे।

अब फिलहाल इस कार्य को करने में सक्षम एक ही व्यक्ति मेरी नजर में आते हैं – कैफे़हिन्दी वाले मैथिली शरण गुप्त जी। मैथिली जी की कंपनी ने हिन्दी के काफी सॉफ्टवेयर बनाए हैं जिनमें हिन्दीपैड तथा कैफेहिन्दी टाइपिंग टूल आदि शामिल हैं। इसके अलावा नॉन-यूनिकोड फॉन्टों में सर्वाधिक प्रचलित कृतिदेव श्रेणी के फॉन्ट भी उन्हीं की कंपनी द्वारा बनाए गए हैं।

अब यदि मैथिली जी कैफेहिन्दी टूल का नॉन-यूनिकोड संस्करण बना सकें अथवा इसी टूल में ऐसी सुविधा जोड़ सकें तो काम बन सकता है। इस टूल को कृतिदेव श्रेणी के सारे फॉन्टों के साथ काम करने लायक बनाया जाए। यदि ऐसा हो जाए तो सभी अयूनिकोडित प्रोग्राम, जिनमें फॉन्ट बदलने की सुविधा उपलब्ध है, उनमें फोनेटिक तथा इनस्क्रिप्ट के उपयोक्ता भी हिन्दी टाइप कर सकेंगे।

मेरे विचार से यह एक क्रांतिकारी कदम हो सकता है जो डीटीपी के क्षेत्र में हिन्दी के लिए बहुत ही उपयोगी होगा। ग्राफिक्स और डीटीपी के क्षेत्र में नॉन-यूनिकोड फॉन्टों से कोई खास नुक्सान भी नहीं खासकर ग्राफिक्स में। बजाय कि एडोब वालों तथा बाकी सभी कंपनियों के भरोसे इंतजार में बैठे रहने के कि कब वे अपने सॉफ्टवेयर को यूनिकोड सक्षम बनाएंगे यह कदम अधिक व्यावहारिक है।

मैथिली जी क्या यह संभव है, आपके इस विषय में क्या विचार हैं?

अपडेट: नॉन-यूनिकोड फॉण्टों में टाइप करने के लिये इस तरह का औजार लेखक द्वारा बनाया जा चुका है ई-पण्डित आइऍमई, इसके बारे में विस्तार से यहाँ पढ़ें।

P.S: इण्डिक कम्प्यूटिंग विशेषज्ञ हरिराम जी ने उपरोक्त प्रश्नों के उत्तर अपने चिट्ठे पर विस्तृत रुप से इस पठनीय लेख में दिए हैं - डीटीपी व ग्राफिक्स सॉफ्टवेयरों में भारतीय युनिकोड अनुकूलता








15 टिप्पणियाँ

  1. आपने हिन्दी के विकास में बाधक प्रमुख मुद्दे उठाये हैं वे एकदम सांप्रत और स्तुत्य है..

    यदि हिन्दी की सेवा करने की भावना है तो सरकारी बाबुओं को यह अवश्य सोचना होगा कि समग्र भारत वर्ष में हिन्दी के फ़ोन्ट एकसमान होने चाहिये, किसी भी प्लेटफ़ोर्म पर कार्य किया जा सके ऐसे होने चाहिये और उसका की-बोर्ड कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छानुसार सेट कर सके ऐसी उसमें व्यवस्था होनी चाहिये…

    आपको ऐसे विषय पर आवाज उठाने के लिये साधुवाद…

  2. श्रीश जी, आपके उठाए गए प्रश्नों के उत्तर अपने ब्लाग पर दे रहा हूँ। फिलहाल संक्षेप में–
    1. इन्स्क्रिप्ट तथा फोनेटिक IME भी 1995 से ISM, Srilipi, Akruti इत्यादि पैकेजों के साथ उपलब्ध है। मैं 1991 से ही इन्स्क्रिप्ट पर ही DTP करते आया हूँ।
    2. ADOBE pagemaker-7.1 1998-99 में निकला था। उसके बाद इसका विकास बन्द हो गया। किन्तु लोग शायद इसके पायराइटेड वर्सन का अभी तक उपयोग करते आए हैं। इसके बाद 2000 में InDesign विकसित हुआ, फिर 2001 में Adobe CS1, फिर CS2 और अब 2007 में CS3 (creative Suite-3) विकसित हो चुके हैं, CS-3 में युनिकोड के Indic version का भी समर्थन है। किन्तु महंगा है तथा ऑनलाइन पंजीकरण के बिना सक्रिय नहीं होता, जिससे आम जनता की पहुँच से बाहर है।
    3. Adobe विण्डोज की त्रुटिपूर्ण तथा जटिल (तीन नावों पर पैर रखकर चलनेवाली) तकनीक से पार निकलकर अपने विशेष Indic OT Fonts (With complete syllables) के विकास में व्यस्त है, जो विण्डोज के rendering engine पर निर्भर हुए बिना यूजर को पूर्ण सही समाधान प्रदान कर सके।
    4. छपाई उद्योग और इण्टरनेट वेब उद्योग दोनों में तालमेल के लिए फिलहाल समाधान एक ही उपलब्ध है : Indic युनिकोड (16 bit) में संसाधित पाठ को अमानकीकृत (8 bit) फोंट्स में बदल कर DTP व मुद्रण आदि हेतु उपयोग करने और छपाई हेतु प्रस्तुत DTP किए गए पाठ को 16 बिट Indic Unicode में परिवर्तित करके Internet तथा Web हेतु उपयोग करने वाली Utilities का प्रयोग।

  3. श्रीश जी, अभी तो मैं आपको कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हूं. कल सुबह मेरा लिनक्स का सर्वर, उसकी बैकअप हार्डडिस्क दोनों उड़ गये. यानी मेरी सभी व्यावसायिक गतिविधियों पर भी विराम लग गया है. कैफेहिन्दी जैसी लगभग 15 अव्यावसायिक वेबसाईट भी अन्तर्जाल से गायब है. जब सर्वर में बैकअप हार्डडिस्क होती है तब आफलाइन बैक अप की कौन सोचता है. मतलब मेरे पास बैकअप के नाम पर सिफर.

    शुक्र है कि ब्लागवाणी इस सर्वर पर नहीं थी. (asp.net) में बनने के कारण.
    तो अभी कुछ दिन के लिये क्षमा.

  4. @VijayKumar Dave,

    विजय जी स‌मस्त फॉन्टों का स‌मान होना आवश्यक नहीं, बल्कि फॉन्टों का यूनिकोडित होना आवश्यक है, यदि टैक्स्ट किस‌ी भी यूनिकोड फॉन्ट में लिखा गया हो तो उसे पढ़ने के लिए आपके कंप्यूटर में कोई भी हिन्दी यूनिकोड फॉन्ट हो तो भी चलेगा।

    @हरिराम,

    हरिराम जी, धन्यवाद इस जानकारी के लिए। आपसे हमेशा कुछ नया जानने को मिलता है।

    1. हाँ कुछ DTP पैकेजों में फोनेटिक तथा इनस्क्रिप्ट लेआउट उपलब्ध हैं लेकिन कोई ऎसा IME होना चाहिए जिस‌से हम अपनी पसंद के किसी भी नॉन-यूनिकोड प्रोग्राम में हिन्दी टाइप कर स‌कें।

    2. हो स‌कता है कि एडोब के नए उत्पाद आ गए हों जो यूनिकोड के मामले में बेहतर हों लेकिन भारत में आम तौर पर अभी फोटोशॉप और पेजमेकर के पुराने वर्जन ही प्रचलित हैं। स‌भी लोग इनमें ही प्रशिक्षित हैं और वे विकल्प उपलब्ध होने पर भी उन्हें नहीं आजमाते।

    इस‌लिए इन पुराने स‌ंस्करणों और अन्य भी कई अयूनिकोडित प्रोग्रामों को देखते हुए Non-Unicode IME की जरुरत है।

    3. वाह यह जानकर वाकई खुशी हुई। मुझे इंतजार है जब यह कार्य स‌ंपन्न हो स‌केगा।

    4. इस‌ बारे जरा विस्तार स‌े बताएंगे कि ऎसा टूल किस‌ प्रकार को हो स‌कता है?

    बाकी इस विषय पर आपके लेख का इंतजार है।

    @Maithily,

    मैथिली जी आपकी स‌मस्या बारे जानकर खेद हुआ। बैकअप का नष्ट होना स‌चमुच गंभीर स‌मस्या है। उम्मीद है जल्द ही आपकी स‌मस्या स‌ुलझ जाएगी।

  5. आपका blog अच्छा है
    मे भी ऐसा blog शुरू करना चाहता हू
    आप कोंसी software उपयोग किया
    मुजको http://www.quillpad.in/hindi अच्छा लगा
    आप english मे type करेगा तो hindi मे लिपि आएगी

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  7. मुझसे बातचीत के दौरान आपकी जिज्ञासाओं का समाधान नहीं हो सका, इसके लिए खेद है। आपकी खीज समझ में आती है कि आपके साथ बातचीत करते समय मैं उस तरह का तकनीकी विश्लेषण नहीं कर सका, जिसकी आप अपेक्षा कर रहे थे। मैं हिन्दी से जुड़े सॉफ्टवेयरों का प्रयोक्ता भर हूं, अपने काम करने लायक उपयोग भर जानता हूं, लेकिन उनका ठीक से विश्लेषण नहीं कर सकता। यह तो आप जैसे मास्साब लोग ही बेहतर कर सकते हैं। मेरे द्वारा जिन बातों को दोहराये जाने को आपने जिद पर अड़ना समझा, उसकी वजह आप समझ सकते हैं।

    मेरे सिस्टम पर आई.एस.एम. और ए.पी.एस. कारपोरेट जैसे हिन्दी के कुछ गैर-यूनिकोड वाले आईएमई सॉफ्टवेयर वर्षों से स्थापित हैं और उनका लगातार उपयोग करता रहा हूं। इन सॉफ्टवेयर के सहारे हिन्दी में पेजमेकर आदि पर काम करना सहज है। अख़बार के दिनों में क्वार्क एक्सप्रेस पर पेज का लेआउट बनाते थे, और हिन्दी के लिए आकृति नामक एक हिन्दी सॉफ्टवेयर प्रयोग में लाते थे और इंस्क्रीप्ट की-बोर्ड के सहारे ही टाइप करते थे। ये सॉफ्टवेयर भारतीय भाषाओं के लिए ही खासकर बनाए गए हैं, लेकिन पेजमेकर, क्वार्क एक्सप्रेस जैसे प्रोग्रामों में आईएमई की तरह ही काम करते हैं। इनमें इंस्क्रीप्ट के अलावा रेमिंगटन और फोनेटिक जैसे कई वैकल्पिक की-बोर्ड भी उपलब्ध होते हैं।

    चूंकि शुरू से ही मेरे हर सिस्टम पर हिन्दी के गैर-यूनिकोडित आईएमई प्रोग्राम पहले से इंस्टाल्ड किए रहते थे, इसलिए पेजमेकर, क्वार्क एक्सप्रेस पर हिन्दी में काम करने में होने वाली दिक्कत को महसूस करने की नौबत मेरे साथ कभी नहीं आई। फिर मैं उसका उस तरह से तकनीकी विश्लेषण कैसे कर पाता, जिस तरह से आप समझना चाहते थे।

    मसलन, बातचीत के दौरान आपका ऐसा ही एक सवाल था, “इनस्क्रिप्ट के नॉन-यूनिकोड फॉन्ट तो नहीं होते”? अब, मेरे लिए इस सवाल को तकनीकी रूप से विश्लेषित करना कितना कठिन होगा, इसे आप समझ सकते हैं, क्योंकि मैंने कंप्यूटर पर पहली बार एमएस-डॉस ऑपरेटिंग सिस्टम के जमाने में जो पहला अक्षर टाइप किया था, वह इंस्क्रीप्ट कीबोर्ड के सहारे हिन्दी के गैर-यूनिकोड फॉण्ट में ही था। आईएसएम और लीप ऑफिस जब से अस्तित्व में आए, मेरे लिए सुलभ रहे। उनके सहारे किसी भी प्रोग्राम पर गैर-यूनिकोडित हिन्दी लिखते समय कोई दिक्कत नहीं हुई। वही सुगमता, यूनिकोड आने के बाद इंडिक आईएमई के सहारे होती है।

    लेकिन ये सब चूंकि मुफ्त के उत्पाद नहीं हैं, इसलिए शायद अधिक लोगों की पहुंच में नहीं आ पाए हैं और शायद इसीलिए इनके बारे में तकनीकी जानकारी की भी कमी है।

    यह कहना कि इंस्क्रीप्ट, फोनेटिक आदि की-बोर्ड प्रणालियों का ज्ञान पूरी दुनिया में केवल एक हजार लोगों को ही होगा, एक गलत अनुमान है। शायद आप सरकारी तंत्र में हो रहे हिन्दी के कामकाज की तरफ ध्यान नहीं दे रहे हैं। भारत सरकार ने भारतीय भाषाओं वाले सभी सॉफ्टवेयर में इंस्क्रीप्ट कीबोर्ड का होना अनिवार्य किया हुआ है। हर विभाग और मंत्रालय के हिन्दी अनुभागों तथा मंत्री कार्यालयों में हिन्दी के सॉफ्टवेयर संस्थापित हैं और उन पर काफी काम भी होता है। ज्यादातर कामकाज अब भी गैर-यूनिकोडित फोंट में ही होता है, लेकिन जिन सॉफ्टवेयर पर होता है, उनमें इंस्क्रीप्ट और फोनेटिक दोनों के विकल्प होते हैं। पूरे देश में फैले केन्द्रीय सरकारी तंत्र का कोई ऐसा कार्यालय नहीं है, जहां हिन्दी में कुछ न कुछ कार्य न होता हो, क्योंकि संवैधानिक रूप से यह अनिवार्य है।हिन्दी में सबसे अधिक आधिकारिक कामकाज संसद में किया जाता है, और वहां के स्टाफ भी इन प्रणालियों से बखूबी अवगत हैं।

    हरिराम जी, शास्त्री जी, रवि जी, अनुनाद जी और आप जैसे चिट्ठाकार साथी हिन्दी के सॉफ्टवेयरों के प्रयोगों का तकनीकी विश्लेषण करने में बखूबी लगे हैं, यह देखकर खुशी होती है।

  8. @Raju & Manoj,

    राजू और मनोज जी हिन्दी टाइप करने बारे पूरी जानकारी यहाँ तथा ब्लॉग बनाने बारे यहाँ है। किसी स‌हायता की आवश्यकता हो तो परिचर्चा फोरम में पूछें।

  9. @सृजनशिल्पी,

    “चूंकि शुरू से ही मेरे हर सिस्टम पर हिन्दी के गैर-यूनिकोडित आईएमई प्रोग्राम पहले से इंस्टाल्ड किए रहते थे, इसलिए पेजमेकर, क्वार्क एक्सप्रेस पर हिन्दी में काम करने में होने वाली दिक्कत को महसूस करने की नौबत मेरे साथ कभी नहीं आई।”

    हम्म तो यह कारण है, इसीलिए आप मेरी तथा अन्य कई प्रयोक्ताओं की परेशानी को स‌मझ नहीं पाए तथा उस दिन जिद पर अडे़ थे कि इन प्रोग्रामों में इनस्क्रिप्ट और फोनेटिक के कीबोर्ड होते हैं।

    “लेकिन ये सब चूंकि मुफ्त के उत्पाद नहीं हैं, इसलिए शायद अधिक लोगों की पहुंच में नहीं आ पाए हैं और शायद इसीलिए इनके बारे में तकनीकी जानकारी की भी कमी है।”

    यही कारण है कि इस विषय में अनेक व्यक्तियों स‌े चर्चा के बावजूद कभी किसी स‌े ISM जैस‌े टूल का पता नहीं चला, पहली बार आप स‌े ही जाना।

    “यह कहना कि इंस्क्रीप्ट, फोनेटिक आदि की-बोर्ड प्रणालियों का ज्ञान पूरी दुनिया में केवल एक हजार लोगों को ही होगा, एक गलत अनुमान है। शायद आप सरकारी तंत्र में हो रहे हिन्दी के कामकाज की तरफ ध्यान नहीं दे रहे हैं।”

    दरअसल आज तक मैंने स‌ामान्यतः स‌भी स‌रकारी कार्यालयों में हिन्दी के लिए MS Office तथा PageMaker के स‌ाथ नॉन-यूनिकोड फॉन्ट यथा कृतिदेव आदि का ही उपयोग होते देखा है तथा इसके लिए उनके ऑपरेटर रेमिंगटन प्रशिक्षित होते हैं। उच्चस्तर के स‌रकारी कार्यालयों में जैसा आपने बताया शायद वैसा हो लेकिन आम स‌रकारी कार्यालय के कर्मचारियों को इनस्क्रिप्ट क्या बला है पता तक नहीं होता।

    कुल मिलाकर मैं चाहता हूँ कि ISM जो कि एक Paid उत्पाद है, उसके विकल्प के रुप में एक मुफ्त Non-Unicode IME बने ताकि स‌र्वसाधारण के लिए भी उपरोक्त प्रोग्रामों में हिन्दी टाइप करना स‌ुलभ हो स‌के।

  10. सरकारी कार्यालयों का जिक्र करते समय आम स्तर और उच्च स्तर के कार्यालयों के रूप में उनका वर्गीकरण करने के बजाय उन्हें केन्द्रीय सरकार के कार्यालय और राज्य सरकारों के कार्यालय समझें तो मेरे कथन को आप बेहतर समझ सकेंगे। केन्द्रीय सरकार के कार्यालयों में राजभाषा से जुड़े नियमों के अनुरूप काम होता है। उनके पास हिन्दी के सॉफ्टवेयर खरीदने के लिए फंड का भी वैसा अभाव नहीं होता, जैसा कि राज्य सरकार के कार्यालयों के पास होता है। सी-डैक केन्द्रीय सरकार के अधीन होने के कारण उनके प्रोडक्ट केन्द्रीय सरकारी कार्यालयों में अधिक प्रचलित हैं। लेकिन उसके अलावा भी हिन्दी के जो सॉफ्टवेयर केन्द्रीय मंत्रालयों में प्रयोग किए जाते हैं, उनमें भी रेमिंगटन के अलावा इंस्क्रीप्ट और फोनेटिक जैसे विकल्प अवश्य होते हैं। यह जरूर है कि पुराने टायपिस्ट जो मैनुअल या इलेक्ट्रानिक टाइपराइटर पर काम करते रहे हैं, अब कंप्यूटर पर भी उसी कीबोर्ड का प्रयोग करते हैं। लेकिन इन पुराने टाइपराइटरों की तरह ये टाइपिस्ट भी अब विलुप्तप्राय श्रेणी के हो चुके हैं। कंप्यूटरीकरण के इस दौर में भारत सरकार ने टाइपिस्टों की बहाली पर लगभग रोक लगा दी है और जो दूसरे लोग कंप्यूटर पर हिन्दी लिखना शुरू करते हैं, वे इंस्क्रीप्ट या फोनेटिक पर ही अभ्यास करते हैं। सरकारी कार्यालयों के अलावा हिन्दी के अखबारों और न्यूज चैनलों में भी ये कीबोर्ड प्रणालियां काफी प्रचलित हैं।

  11. Respected sir,
    is any software for the hindi spell check. please let me known. thanks

  12. श्रिष,
    हमने रेमिंगटन टाइपिंग पर कुछ मेहनत कर कई सुधार किय है | इसे आप http://remington.tangere.in/ पर प्रयोग कर सकते है |

ट्रैकबैक

  1. माध्यम – कृतिदेव फॉण्ट में इन्स्क्रिप्ट लेआउट द्वारा हिन्दी टाइप करने हेतु औजार | ई-पण्डित / ePandit &#
  2. हिन्दीपैड – कृतिदेव फॉण्ट में फोनेटिक लेआउट द्वारा हिन्दी टाइप करने हेतु औजार | ई-पण्डित / ePandit –
  3. फोटोशॉप का यूनिकोड हिन्दी/इण्डिक समर्थन युक्त संस्करण डाउनलोड करें | ई-पण्डित / ePandit – Hindi Tech Blog

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