ई-पण्डित लैब्स – पण्डित जी की प्रयोगशाला का शुभारम्भ
जुगाड़ – भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह एक आम शब्द है। हम सब विभिन्न कामों के लिये जुगाड़ बनाते-भिड़ाते हैं। जुगाड़ की महिमा अपार है, पुराने समय में हिन्दी तकनीकिज्ञों और चिट्ठाकारों ने जुगाड़ों के सहारे ही हिन्दी को इस मुकाम तक पहुँचाया। ऐसे ही कम्प्यूटर एवं हिन्दी सम्बंधी अपने विभिन्न जुगाड़ों के लिये इस प्रयोगशाला का आरम्भ किया जा रहा है।
अब शुरु कर रहे हैं तो कुछ नाम भी टेकना पड़ेगा तो नाम दिया है: ई-पण्डित लैब्स
अब बात आती है कि इस चीज की जरुरत क्यों पड़ी। कहानी थोड़ी पुरानी है, कभी हमारा एक स्वप्न हुआ करता था कि हिन्दी जगत के धाकड़ प्रोग्रामरों तथा डेवलपरों की एक टीम बने जो कि मिल-जुल कर हिन्दी कम्प्यूटिंग सम्बंधी औजार बनाये। तब मुझे लगता था मैं उस टीम को आइडिये दिया करुँगा तथा उन पर कार्य हो सकेगा। इस काम के लिये लोगों को इकट्ठा करने की खातिर हमने बहुत जोर लगाया, लेकिन कई कारणों से यह स्वप्न अधूरा ही रह गया। इस परियोजना के लिये नाम (निपुण) तक तय हो गया था, लेकिन कुछ तो गीकों के अहं के टकराव के कारण तथा कुछ इस दौरान हिन्दी का प्रसार काफी बढ़ गया था सो सबकी रुचि भी इसमें जाती रही। यह नई अदभुत टीम तो क्या बननी थी उल्टा पुराना समूह अक्षरग्राम नेटवर्क ही आज खुद इतिहास में दफन हो गया है।
इसके अलावा मैंने समय-समय पर हिन्दीजगत से जुड़े कुछ प्रोग्रामरों आदि को विभिन्न सुझाव दिये परन्तु उन पर कोई विशेष प्रगति न हुयी, मेरे सुझाव तथा फीडबैक बेकार गये। मुझे फिर लगा कि आप मरे बिना स्वर्ग नहीं दिखता तो कुछ तो यह गीकी खुजली का मामला है और आइडिये अब भी आते हैं तो निश्चय किया गया कि अपना हाथ जगन्नाथ। तो इसी उद्देश्य के साथ थोड़ी बहुत प्रोग्रामिंग सीखनी शुरु की. कुशलता हासिल करने में अभी समय लगेगा। फिलहाल हम मसिजीवी के शब्दों में अर्धपग्गल हैं। जुगाड़ टैक्नोलॉजी में विश्वास रखते हैं तथा गुरु गूगल बाबा के आशीर्वाद से ट्रायल ऍण्ड ऍरर विधि से कोडिंग करते हैं।
जुगाड़ टैक्नोलॉजी का एक उदाहरण देना चाहूँगा – हिमांशु भाई का हिन्दी टूलकिट, बिना विण्डोज़ की सीडी के कम्प्यूटर में हिन्दी समर्थन इंस्टाल करने हेतु एक इंस्टालर। मैं इसे कमाल का क्रान्तिकारी जुगाड़ आविष्कार मानता हूँ। यह टूल सैकड़ों-हजारों हिन्दी चिट्ठाकारों के आड़े वक्त पर काम आया है। देखा जाय तो छोटा सा लेकिन कमाल का इनोवेटिव विचार था। आज कोई प्रोग्रामर इस टूल के बारे में कह सकता है कि इसे बनाना ऐसा क्या कठिन काम था, लेकिन टूल बनाने से ज्यादा मैं इसके विचार, इसकी फिलॉस्फी, इसके इथिक्स को क्रान्तिकारी मानता हूँ।
ऐसे अनेक जुगाड़ों की हिन्दीजगत को आवश्यकता है और इसी दिशा में काम करने हेतु मेरा यह एक प्रयास है।
प्रयोगशाला का पहला जुगाड़ – टचस्क्रीन फोन हेतु हिन्दी कुञ्जीपटल कल आ रहा है।






















बहुत-२ बधाई और शुभकामनाएँ
अब यह सरासर ज़्यादती है और खामखा की तोहमत है। तुम लगभग २ वर्ष सीन से गायब रहे, उस दौरान क्या हुआ तुमको खास कुछ पता नहीं। न यह पता कि उस दौरान कौन से काम हुए, किन चीज़ों पर काम हुआ और फिर काम क्यों रुका। इसलिए मैं यही कहूँगा कि जिस चीज़ की जानकारी न हो उसके विषय में विश्वास से नहीं कहना चाहिए और दूसरों पर तोहमत नहीं लगानी चाहिए।
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dekhte rahenge maassab, aapki purani pathshala ke student hai so yahi jame rahenge aasan jamakar, paas ho ke agli kaksha me nai jane wale apan to.
himanshu jee ke hinditool kit ko to mai ultimate manta hu, apne yahoo mail me save kr ke rakha hua hai use, jab bhi kisi ko dikkat aaye fauran hindi writer ke sath email kar deta hu, shukriya unhe..
shubhkamnayein
अरे वाह अगली पोस्ट हमारे लिए नायाब होगी
अरे वाह अगली पोस्ट हमारे लिए नायाब होगी
इस पोस्ट के लिए शुक्रिया
अरे वाह अगली पोस्ट हमारे लिए नायाब होगी
इस पोस्ट के लिए शुक्रिया
blockquote>ट्रायल ऍण्ड ऍरर विधि !
अरे इस विधि में तो हमको भी बड़ा विश्वास है ….पर अपन तो तकनीक और ओडिंग और कोडिंग के मामले पे पूरे डबल जीरो हैं | हाँ आइडिये तो मुफ्त में तारका सकते है |
बधाई !
@amit,
दो साल के दौरान का तो पता नहीं पर उससे पहले के समय का अपने अनुभव से ही कहा है, बाकी हाँ उन दो साल के दौरान की स्थितियाँ मुझे वाकई पता नहीं।
@Gyan Dutt Pandey,
जी कोशिश करेंगे रोचक हो।
@Sanjeet Tripathi,
जी बिलकुल, इस मामले में मैं हिमांशु जी से ही प्रेरित हूँ।
@वीनस,
ओह हाँ, आपके पास भी नोकिया ५८०० है, इस जुगाड़ से आप फोन में हिन्दी लिखने का शौक पूरा कर सकते हैं।
@प्रवीण त्रिवेदी,
चलिये इस मामले में हम दोनों ही मास्साब एक हैं।