दैनिक जागरण ने ई-पण्डित का लेख उड़ाया
कल सुबह अखबार पढ़ रहा था तो देखता हूँ कि हिन्दी में ब्लॉग लिखने बारे लेख है। पढ़ने लगा तो यह पंक्ति देखी “इस काम को स्मार्ट तरीके से करने के लिये…”, मैं चौंका ये तो मेरे शब्द हैं इसके अलावा लेख में कई जगह मेरी भाषा देखी। लेख ध्यान से पढ़ा तो पाया कि ये मेरे विण्डोज़ में हिन्दी समर्थन सक्षम करने तथा कीबोर्ड जोड़ने बारे मेरे दो लेखों में काँट-छाँट कर तथा कुछ फेरबदल कर लिखा गया है। एक तो लेख बिना अनुमति छापा गया और वो भी बिना कोई सन्दर्भ दिये।
लेख किन्हीं हरेन्द्र चौधरी द्वारा लिखा (?) गया है। कमाल है जागरण जैसे बड़े समाचारपत्र भी साहित्यिक चोरी पर उतर आये हैं। इससे पहले भी याहू/जागरण तरकश के लेख बिना अनुमति उड़ा चुका है।






















इसे कहते हैं…चोरी..और फिर सीनाजोरी
बधाई जी…
वैसे मैं इसे अखबार को दोषी नहीं मानता… लेखक जिसने अपने नाम से लेख भेजा है वो जिम्मेवार है.. एक नोटिस थमाइये.. शायद अगली बार ध्यान रखे..
इसमें दोष लेखक का है |
मेरे ब्लॉग से भी जागरण ने कुछ लेख लिए थे पर उन्होंने छापने से पहले मेरे से अनुमति ले थी |
हाँ कुछ अख़बारों ने मेरे ब्लॉग से बिना अनुमति लेख छापें है पर उन्होंने मेरे नाम या ब्लॉग का संदर्भ दिया है |
कहां तक गिनेंगे। लोगोम की आदत ही खराब हो गयी है। कई लेखक और सम्पादकीय विभागों में गद्दी पर बैठे कई लोग ऐसे हैं। मेरे साथ भी कई बार कई परिचित-अपरिचितों ने ऐसा किया है। दिल्ली और तमाम जगहों से प्रकाशित दैनिक हिन्दुस्तान ने प्रभासाक्षी.कॉम में प्रकाशित एक लेख दो अंकों में ज्यों का त्यों छाप दिया-बिना लेखक या स्रोत का नाम दिए। हिन्दी के समाचार चैनल सीएनईबी ने मेरे ५-६ कार्टून अपने एक कार्यक्रम चौबेजी की चौपाल के पार्श्व में लगा डाले-मनमाने फ़ेरबदल के साथ। एक पाक्षिक ने तो मेरे प्रकाशित एक लेख का उपयोग मुख पृष्ठ पर सम्पादकीय के रूप में कर डाला-अपने हस्ताक्षर के साथ। हाल ही में मध्य प्रदेश के जानेमाने और सम्पन्न मालिक के नये दैनिक अखबार पीपुल्स समाचार में मेरा कार्टून छाप ऐसे ही छाप दिया। पत्र का भी जवाब नहीं…..यह हाल बड़ों का है, छोटों के बारे में क्या कहा जाए! सभी कानूनी पचड़े में नहीं पड़ना चाहते, कारण- न्याय कब मिलेगा पता नहीं…
इतने बड़े जगत में इतने सारे अखबार और साईट्स हैं कि पता ही नहीं चलता कि लेख मौलिक है या नहीं
सारी गल्ती लेखक की ही है !!
एक बार मैं ट्रेन में यात्रा कर रहा था. हाकर से अखबार खरीदा. जाहिर है जागरण ही था. एक व्यंग्य छपा था. भाषा जानी पहचानी लगी. याद आया अरे ये तो मेरा व्यंग्य है, गनीमत है कि अंत में नाम दे दिया था. पूछने की बात तो छोड़ दें, सूचित करने का काम भी नहीं करते. लेखों में थोड़े मोड़े फेर बदल कर बिना क्रेडिट छापना तो खैर आम बात है.
नेट पर आपने कुछ डाल दिया तो ये मानकर चलें कि लोग जहाँ मर्जी पड़े कॉपी करेंगे ही, आप रोक नहीं सकते.
@राजीव तनेजा,
सही कहा।
@रंजन,
हाँ वैसे आपने सही कहा। अधिकतर मामलों में हो सकता है अखबार को इस बात का पता ही न हो, वो तो जो लेखक ने दे दिया छाप देंगे।
@रतन सिंह शेखावत,
अगर सन्दर्भ दे दिया जाय तब भी कुछ संतोष हो जाता है लेकिन अपना लेख किसी और के नाम से छपा देखना वाकई निराशाजनक है।
@ता.च.चन्दर,
लो कर लो बात, लेख के अलावा कार्टून भी उड़ाये जाने लगे हैं!
@विवेक रस्तोगी,
सही कहा, कम्प्यूटर और इण्टरनेट के युग में तो साहित्यिक चोरी बस कॉपी और पेस्ट का काम है।
@संगीता पुरी,
सहमत।
@रवि,
आपके व्यंग्य अखबार में कई बार पढ़े हैं, पता नहीं कब पूछ कर और कब बिना पूछे छापे जाते रहे हों। इस समस्या को रोकना वाकई मुश्किल है।
यह सब देख कर कभी कभी मन करता है कि मैं भी एक अखबार डाल ही दूं । सारा मैटर नेट से उठा लिया करूंगा । लेखक का भी नाम डाल दिया करूंगा । लेखक भी खुश और हम तो खुश होंगे ही, बिना कोई कर्मचारी रखे अखबार जो चला रहे होंगे । आप क्या कहते हैं गुरू जी ।
कोई अखबार यह कैसे पता लगाये कि लेख चुराया गया है?
you cant blame on publish articals.you have publish thats why they have stolen.
वाह शैली जी, खूब कही….
मतलब गलती ब्लोगर की है.. वो लिखता ही क्यूँ है? लिखे ही नहीं, लिखने का शौक है ही तो अपनी डायरी में लिखे.. ना रहेगा बांस ना बजेगी बांसुरी, है ना
कुछ तो सोच समझ कर बोला करो.
यह समस्या हिंदी मे शायद अधिक है। मेरी राय है कि आप क्रियेटिव कामन शेयर एलाईक लाईसेंस का प्रयोग करें और इस बात को हाईलाईट करें कि पुन:प्रकाशन की पूर्ण स्वतंत्रता है — इस शर्त पर कि आभार दिया जाये। इससे चोरी तो नही रूकेगी लेकिन उचित आभार मिलना अवश्य शुरू हो जायेगा।