Archive for the ‘अश्रेणीबद्ध’ Category

पहली हाइ लैवल प्रोग्रामिंग भाषा कौन सी थी? [प्रश्नकाल]

Saturday, June 16th, 2012

प्रश्न-२:- पहली हाइ लैवल प्रोग्रामिंग भाषा कौन सी थी?

उत्तर:- पहली हाइ लैवल प्रोग्रामिंग भाषा फोरट्रान (Fortran) थी। इसका विकास १९५६ में जॉन बैकस के नेतृत्व में एक IBM की टीम ने किया था। हालाँकि व्यावसायिक रूप से यह १९५७ में उपलब्ध हुयी।

Command Line...

यह एक जनरल-परपज प्रोग्रामिंग भाषा है जो कि विशेषकर अंकीय गणनाओं तथा वैज्ञानिक कम्प्यूटिंग के लिये उपयुक्त है। ५० के दशक में विज्ञान तथा अभियान्त्रिकी के क्षेत्र में इसका प्रयोग लोकप्रिय हुआ जो अब भी जारी है। इसका प्रयोग कम्प्यूटर प्रोसैसरों की परफॉर्मेंस जाँचने में भी किया जाता है।

फोरट्रान को हमने डॉस के जमाने में प्रयोग किया था, ज्ञानदत्त जी तो पंच कार्ड के जमाने में प्रयोग किया था। हमारे पास यह बी॰ ऍससी॰ प्रथम वर्ष में थी। हालाँकि अपने सीनियरों को सी जैसी भाषाओं में विविध प्रोग्राम बनाते देख हमें लगता था कि यह किसी खास काम की नहीं।

मोहित जैन जी एवं मनीष सेन जी का उत्तर सही है। सभी टिप्पणीकर्ताओं को धन्यवाद।

Q & A – Which was first high level programming language?

कम्प्यूटर का पितामह किसे कहा जाता है? [प्रश्नकाल]

Friday, June 15th, 2012

आज प्रश्नोत्तरी का आरम्भ करने जा रहा हूँ। पहला प्रश्न कम्प्यूटर से ही सम्बन्धित है और काफी सरल है। अधिकतर लोगों ने अपने स्कूली दिनों में इसे जरूर पढ़ा होगा।

प्रश्न-१:- कम्प्यूटर का पितामह किसे कहा जाता है?

उत्तर:- चार्ल्स बैबेज (१७९१-१८७१) को कम्प्यूटर का पितामह कहा जाता है। वे एक अंग्रेज गणितज्ञ, दार्शनिक, आविष्कारक तथा मैकेनिकल इंजीनियर थे जिन्होंने प्रोग्राम किया जा सकने वाले कम्प्यूटर का कंसैप्ट प्रस्तुत किया था। उन्होंने १८२३ में पहला ‘कम्प्यूटर’ बनाया था जो कि एक भाप-चलित कैल्कुलेटिंग मशीन थी।

अनिल जी, आशीष जी एवं मनीष जी तीनों का उत्तर सही है। आशीष जी के उत्तर में थोड़ा संशोधन करना चाहूँगा। ऍलन ट्यूरिंग को कम्प्यूटर का नहीं ‘कम्प्यूटर विज्ञान का पितामह’ (Father of Computer Science) कहा जाता है। ब्लेज पास्कल की भी कम्प्यूटर के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका है पर उनके लिये कम्प्यूटर का पितामह  कहीं नहीं लिखा जाता।

Q & A – Who is known as father of computer?

प्रश्नकाल ~ ई-पण्डित पर प्रश्नोत्तरी शुरु हो रही है

Tuesday, June 12th, 2012

ब्लॉगिंग में ‘राइटर्स ब्लॉक’ एक आम चीज है। कई बार लिखने का मन नहीं करता, कई बार विषय नहीं सूझता और कई बार सूझने पर भी आलस्यवश लिखा नहीं जाता। शायद इन्हीं बातों ने माइक्रोब्लॉगिंग को जन्म दिया जिसके फलस्वरूप लोगों की ब्लॉगिंग का बहुत सा हिस्सा आजकल ट्विटर और फेसबुक की भेंट चढ़ रहा है। इस बीच मैंने कई बार सोचा कि ना लिखने से अच्छा है थोड़ा लिखना, इसलिये इस ब्लॉग पर ही छोटी पोस्टें लिखा करूँ। हालाँकि जब भी लिखने बैठा लम्बा ही हो गया।

Questions Mark

हमारे मित्र यमुनानगर के चिट्ठाकार दर्शन बवेजा जी का एक हिट चिट्ठा है – हर रोज एक प्रश्न, जिस पर वे  विज्ञान से सम्बन्धित प्रश्न पूछते हैं। तो इसी से प्रेरणा लेकर मैंने भी सोचा कि अपने चिट्ठे पर तकनीक सम्बन्धी ऐसी ही प्रश्नोत्तरी शुरु की जाय। अब दर्शन जी की तरह रोज एक प्रश्न बिना नागा पोस्ट करना तो अपने बस में नहीं इसलिये बीच-बीच में किया करेंगे। कोशिश रहेगी दर्शन जी की तरह रुचिकर और ज्ञानवर्धक प्रश्न पूछने की।

प्रश्नों वाली सभी पोस्टें प्रश्नकाल टैग के अन्तर्गत होंगी। हर प्रश्न वाली पोस्ट के शीर्षक में गिजमोडो की शैली में कोष्ठक में प्रश्नकाल लिखा होगा। आशा है यह प्रयास सफल होगा। हमारी ब्लॉगिंग की फ्रीक्वेंसी और दर्शकों की रुचि एवं जानकारी बढ़ाने में।

Q & A starting on ePandit

अमर उजाला के राष्ट्रीय संस्करण में टैबलेट सम्बन्धी लेख में ई-पण्डित

Thursday, May 17th, 2012

अमर उजाला के राष्ट्रीय संस्करण में फिर से पण्डित जी का उल्लेख हुआ है। Hi टैक नामक पन्ने पर ‘और भी हैं आकाश’ नामक लेख में फोटो एवं वक्तव्य प्रकाशित हआ है। उमाशंकर मिश्र जी के इस लेख में विद्यार्थियों के लिये उपयुक्त टैबलेट के बारे में चर्चा की गयी है।

ePandit_in_Amar_Ujala_17May2012

» समाचार वाला पूरा पन्ना

Edition बॉक्स में ऍडीशन और बायीं तरफ साइडबार में पेज नं॰ चुनें। कुछ संस्करणों में पेज नं॰ १४ पर है और कुछ में पेज नं॰ १० पर। दिल्ली वाले संस्करणों में पेज नं॰ १४ पर है। यमुनानगर/अम्बाला वाले संस्करण में पेज नं॰ १० पर है।

» अलग से समाचार देखें (यूनिकोड में)

उल्लेख के लिये उमाशंकर जी का आभार।

ePandit Shrish in tablets related article in Amar Ujala

अमर उजाला के राष्ट्रीय संस्करण में ई-पण्डित

Thursday, May 10th, 2012

अमर उजाला के राष्ट्रीय संस्करण में पण्डित जी का उल्लेख हुआ है। Hi टैक नामक पन्ने पर ‘पीढ़ियों को जोड़ते सॉफ्टवेयर’ नामक लेख में फोटो एवं वक्तव्य। उमाशंकर मिश्र जी के इस लेख में सॉफ्टवेयर की दुनिया में हो रहे बदलावों पर प्रकाश डाला गया है।

Amar_Ujala_10May2012

» समाचार वाला पूरा पन्ना

Edition बॉक्स में ऍडीशन और बायीं तरफ साइडबार में पेज नं॰ चुनें। कुछ संस्करणों में पेज नं॰ १४ पर है और कुछ में पेज नं॰ १२ पर। दिल्ली वाले संस्करणों में पेज नं॰ १४ पर है। यमुनानगर/अम्बाला वाले संस्करण में पेज नं॰ १२ पर है।

» अलग से समाचार देखें (यूनिकोड में)

वक्तव्य के छपने में एक छोटी सी भूल है। अन्तिम पंक्ति में ‘विण्डोज़ ८ की एक और खास बात होगी कि यह डैस्कटॉप के साथ मोबाइल डिवाइसों पर भी काम करेगा’ होना चाहिये था। उमाशंकर जी का आभार।

ePandit mentioned in Amar Ujala

सी तथा यूनिक्स के जनक डैनिस रिची का निधन

Sunday, October 16th, 2011

हाल ही में प्रोग्रामिंग के भीष्म पितामह कम्प्यूटर वैज्ञानिक डैनिस रिची का निधन हो गया। वे आधुनिक कम्प्यूटर विज्ञान की आधारशिला रखने वालों में से एक थे। उनका कम्प्यूटर विज्ञान में वही स्थान है जो भौतिकी में आइंस्टीन का है। यद्यपि वे आम जनता में स्टीव जॉब्स की तरह प्रसिद्ध नहीं थे लेकिन कम्प्यूटर विज्ञान से जुड़े लोग उनके योगदान से भली-भाँति परिचित हैं।

डैनिस रिची ने कॅन थॉम्पसन के साथ यूनिक्स ऑपरेटिंग सिस्टम के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। यूनिक्स कमांड लाइन सिस्टम होते हुये भी मल्टीटास्टिंग तथा इंटरनेट आदि उन्नत सुविधाओं से लैस था। यूनिक्स आगे चलकर बहुत से ऑपरेटिंग सिस्टमों का आधार बना जिनमें लिनुस टॉरवैल्ड द्वारा विकसित लिनक्स शामिल है। ऍपल का मॅक ओऍस (तथा आइओऍस भी) बीऍसडी पर आधारित है जो कि यूनिक्स से ही बना था। लोकप्रिय मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम ऍण्ड्रॉइड की भी जड़ें यूनिक्स (लिनक्स के रास्ते) में ही हैं। इस प्रकार विण्डोज़ को छोड़कर आज के लगभग सभी प्रमुख ऑपरेटिंग सिस्टमों का पूर्वज यूनिक्स ही है।

डैनिस रिची ने सी प्रोग्रामिंग भाषा का भी निर्माण किया। दिलचस्प बात यह है कि रिची ने सी का विकास यूनिक्स बनाने के लिये ही किया था। सी दुनिया की सबसे लोकप्रिय प्रोग्रामिंग भाषा है। इसी से आगे चलकर सी++ बनी जिस पर आधुनिक समय की दो प्रमुख प्रोग्रामिंग भाषायें सन/ऑरेकल की जावा तथा माइक्रोसॉफ्ट की सी शार्प आधारित हैं। ऍपल के सॉफ्टवेयरों हेतु भी ऑब्जैक्टिव सी का प्रयोग होता है। इनके अलावा भी जावास्क्रिप्ट आदि बहुत सी अन्य भाषाओं का सिंटैक्स भी सी पर ही आधारित है। इस प्रकार विजुअल बेसिक आदि को छोड़कर आज की अधिकतर प्रोग्रामिंग भाषाओं की पूर्वज सी है।

अलविदा डैनिस रिची। आज हम जब भी कोई कम्प्यूटर, कम्प्यूटिंग डिवाइस या वेब सर्विस प्रयोग करते हैं तो उसमें कहीं न कहीं डैनिस की तकनीक मौजूद है। इस तरह डैनिस रिची हमारे बीच हमेशा मौजूद रहेंगे।

आशीष श्रीवास्तव जी ने डैनिस को कुछ इस तरह श्रद्धाँजलि दी:-

‎#include stdio.h
(void) main()
{

(void) printf("Goodbye, world!");

}

डैनिस के बारे में विस्तार से विकिपीडिया पर यहाँ पढ़ें।

RIP Dennis Ritchie

दैनिक जागरण ने ई-पण्डित का लेख उड़ाया

Sunday, June 20th, 2010

कल सुबह अखबार पढ़ रहा था तो देखता हूँ कि हिन्दी में ब्लॉग लिखने बारे लेख है। पढ़ने लगा तो यह पंक्ति देखी “इस काम को स्मार्ट तरीके से करने के लिये…”, मैं चौंका ये तो मेरे शब्द हैं इसके अलावा लेख में कई जगह मेरी भाषा देखी। लेख ध्यान से पढ़ा तो पाया कि ये मेरे विण्डोज़ में हिन्दी समर्थन सक्षम करने तथा कीबोर्ड जोड़ने बारे मेरे दो लेखों में काँट-छाँट कर तथा कुछ फेरबदल कर लिखा गया है। एक तो लेख बिना अनुमति छापा गया और वो भी बिना कोई सन्दर्भ दिये।

 Jagran_ePandits_article

लेख किन्हीं हरेन्द्र चौधरी द्वारा लिखा (?) गया है। कमाल है जागरण जैसे बड़े समाचारपत्र भी साहित्यिक चोरी पर उतर आये हैं। इससे पहले भी याहू/जागरण तरकश के लेख बिना अनुमति उड़ा चुका है।

ई-पण्डित की अज्ञातवास से वापसी

Sunday, February 14th, 2010

ePandit comes out of hibernation

हिन्दी चिट्ठाजगत के सभी मित्रों एवं पाठकों को नमस्कार। जैसा कि आप सब जानते हैं कोई दो साल पहले हम चिट्ठाकारी से अस्थायी संन्यास लेकर इंसानों की दुनिया में वापस चले गये थे। यह सब अचानक ही हुआ, इसका कारण इण्टरनेट एवं ब्लॉगिंग की ऍडिक्शन तथा कैरियर को लेकर चल रहा संघर्ष था। शुरु में नेट बन्द कनैक्शन कटवा देने एवं ब्लॉगिंग बन्द के बाद बहुत बैचेनी होती थी, कोई एकाध महीना तो बहुत दिक्कत रही, लेकिन धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य होता गया। वैसे ऑफलाइन जिन्दगी के दौरान अनुभव किया कि इण्टरनेट एवं ब्लॉगिंग के अलावा भी जिन्दगी में बहुत कुछ है। सच कहें तो एक तरह से ऑफलाइन जिन्दगी बहुत सुकून भरी रही।

ऑफलाइन जिन्दगी के दौरान की कुछ मुख्य उपलब्धियाँ ऍमऍससी (कम्प्यूटर विज्ञान) में विश्वविद्यालय में तृतीय स्थान सहित उत्तीर्ण करना, हरियाणा अध्यापक पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण करना तथा सरकारी सेवा में नियुक्ति रहीं। नौकरी की चिन्ता समाप्त  होने के बाद वापसी की योजना बनने लगी। पहले मोबाइल से ट्विटर पर चहचहाना शुरु किया। इसके बाद अपना डोमेन तथा होस्टिंग स्पेस लेकर चिट्ठा बनाया। ब्लॉगर से चिट्ठे को वर्डप्रैस में इम्पोर्ट करने तथा सैटअप आदि करने में मित्र अमित गुप्ता ने बहुत सहायता की जिसके लिये उनका हार्दिक आभारी हूँ। इसके बाद चिट्ठे को सजाने-संवारने तथा परिष्कृत करने में बहुत वक्त लग गया। देर लगने का मुख्य कारण वर्डप्रैस पर काम करने का अनुभव न होना रहा। इसके अतिरिक्त व्यक्तिगत बकबक के लिये एक अन्य चिट्ठा बनाया है।

तो पण्डित जी की पाठशाला दोबारा चालू होने जा रही है। दो सालों के दौरान हिन्दी चिट्ठाजगत बहुत बड़ा हो गया है, उम्मीद करता हूँ पुराने पाठक भूले नहीं होंगे।

नये पाठक मेरे बारे में अंग्रेजी में यहाँ तथा हिन्दी में यहाँ पढ़ सकते हैं। ई-पण्डित चिट्ठे के बारे में यहाँ पढ़ें।

कुछ कड़ियाँ

टैस्टिंग: मोबाइल से ब्लॉग पोस्ट

Friday, October 2nd, 2009

यह टैस्ट पोस्ट नोकिया 6070 पर ओपेरा मिनी v3.1 में सीधे ब्लॉगर.कॉम से (वेब इण्टरफेस से न कि ईमेल द्वारा) लिखी जा रही है देखते हैं कि बात बनती है या नहीं?

गुयाना में हिन्दी है पर देवनागरी गुम

Wednesday, October 10th, 2007

कुछ समय से भोमियो तथा चिट्ठाजगत.कॉम द्वारा द्वारा हिन्दी चिट्ठों को रोमनागरी में पढ़ने के लिए लिप्यंतरण (Transliteration) सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। कुछ साथी इस सुविधा को बेकार बताने पर तुले हुए हैं, वे दरअसल इसका मर्म नहीं समझते। अब जैसा कि मैं पहले भी बता चुका हूँ दुनिया में सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैण्ड, ज़िम्बाब्वे, दक्षिण अफ़्रीका, मालदीव, मॉरीशस, फ़िजी, गुयाना, दुबई, मलेशिया, सूरीनाम, बर्मा (म्यांमार) आदि से लेकर पाकिस्तान, अफगानिस्तान आदि तक कई देश हैं जहाँ के लोग हिन्दी तो समझ लेते हैं लेकिन देवनागरी नहीं पढ़ सकते। ऐसे लोगों के लिए यह सुविधा निश्चय ही उपयोगी होगी।

उदाहरण के लिए मैं दैनिक जागरण में कुछ माह पूर्व छपे एक समाचार का संदर्भ दे रहा हूँ।

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कैरीबियाई देश गुयाना में भारतीय मूल के ४३% से ज्यादा लोग बसे हुए हैं। वे धड़ल्ले से संस्कृत में श्लोक सुनाते हैं, भजन गाते हैं और हिन्दी फिल्मों के मुरीद हैं, लेकिन अफसोस इस बात का है कि लोग हिन्दी को रोमन लिपि से जिन्दा रखे हुए हैं और देवनागरी लिपि अपना अस्तित्व खो चुकी है।

Guana Island - चित्र को मूल आकार में देखने हेतु क्लिक करें

डेढ़ सौ साल पहले गिरमिटिया मजदूर के रुप में ये भारतीय गुयाना गए और फिर वहीं बस गए। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार से गए इन भारतीयों ने अपने धर्म, संस्कृति और रीति-रिवाज को आज भी मानो सीने से लगा रखा है। उनके घरों में हिन्दी बोली जाती है खासकर नाती, पोते का दादा, दादी और नाना, नानी से आज भी हिन्दी में सम्वाद होता है। बच्चों का नामकरण पण्डित कराते हैं और उनके नाम हिन्दी में रखे जाते हैं पर वे देवनागरी में नहीं, बल्कि रोमन हिन्दी में लिखे जाते हैं मसलन अंग्रेजी के अक्षर से हिन्दी का उच्चारण किया जाता है। उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत के साथ गए प्रतिनिधिमण्डल की अगवानी करने आई राधा प्रसाद अली ने बताया कि यहाँ बड़े धूम-धाम से दीवाली और होली मनाई जाती है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन नदी में स्नान करके पूजा, पाठ किया जाता है और इसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु हिस्सा लेते हैं। मन्दिरों में सवेरे, शाम पूजा, अर्चना होती है जिसमें सभी भजन कीर्तन करते हैं। गायत्री मन्त्र का धड़ल्ले से जाप करने वाली अली ने अपने मुसलमान दोस्त से छह वर्ष पहले हिन्दू रीति रिवाज से विवाह रचाया और फिर ससुराल में निकाहनामा पढ़वाया। उसकी साढ़े तीन साल की बिटिया है। पण्डित ने उसकी बिटिया का नाम पार्वती रख दिया। जॉर्ज टाउन और उसके आसपास के इलाकों में जाने पर पता लगा कि अगर किसी हिन्दू के घर की पहचान करनी हो तो बस एक बात का ध्यान रखना काफी है। जिस घर के सामने बांस में ध्वज फहराता दिखे उसे आँख मूँदकर हिन्दू का घर मान लीजिए मसलन वह भारतीय मूल का है। दरअसल यहाँ भारतीय और हिन्दू एक दूसरे के पर्याय के रुप में जाने जाते हैं। पेशे से ड्राइवर राम दशरथ के पूर्वज उत्तर प्रदेश से यहाँ आए थे। वह किस शहर या गाँव के थे राम दशरथ को इसका पता नहीं है, लेकिन अब उसके मन में कभी कभी भारत जाने की इच्छा होती है। राम दशरथ ने कहा कि अब तो हम गुयाना के वासी हैं और हमें इस पर गर्व है। यहाँ पर अफ्रीका, पुर्तगाल और चीन के लोग रहते हैं। उनके दादा परदादा भी मजदूरी करने आए थे और फिर वे यहीं पर बस गए। हमें इससे फर्क नहीं पड़ता कौन कहाँ से आया है।

गुयाना के एक बड़े डिपार्टमैण्टल स्टोर में काम करने वाली अनिता ने बड़े आत्मविश्वास से कहा कि ‘यू हैव कम फ्रॉम इण्डिया’, सबने एक साथ हामी भरी। फिर क्या था अनिता उनके साथ हो ली और खरीददारी में उनकी मदद करने के साथ हिन्दी में सम्वाद करती रही। उसने स्वीकार किया कि देवनागरी के बारे में उसे पता नहीं हाँ वहाँ अंग्रेजी के अक्षर से हिन्दी और संस्कृत में सम्वाद करते हैं। आलम यह है कि रामायण, गीता, दुर्गा सप्तशती और देवी, देवताओं के लिए गाई जाने वाली आरती की किताबें रोमन हिन्दी में बाजारों में उपलब्ध हैं।

समाचार: २० नवम्बर २००६, दैनिक जागरण से साभार

चित्र: वर्ल्ड ऑफ आईलैण्ड्स से साभार

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उपरोक्त समाचार पढ़कर वाकई अफ़सोस होता है कि कई देशों में देवनागरी या तो लुप्त हो चुकी है या लुप्त होने की कगार पर है। खैर, उपरोक्त उदाहरण से भोमियो और चिट्ठाजगत.कॉम आदि की लिप्यंतरण सेवाओँ की सार्थकता सिद्ध होती है।

सम्बंधित कड़ियाँ