सुना है कि गिरिराज भाई आजकल दुखी टाइप हो रहे हैं और इसी हालत में वो अजीब-अजीब दार्शनिक बातें कर रहे हैं। नहीं-नहीं सरकार कविता लिखने पर प्रतिबंध नहीं लगाने जा रही। इसका कारण फुरसतिया भाईसाहब बता रहे हैं। तो फिर गिरिराज भाई नालायक मन को कोसने में लगे हैं। अब हमारा फर्ज बनता है कि ऐसे मैं हम ऑपरेशन गिरिराज भाई को हँसाना है चलाएं। इसी श्रृखंला की पहली कड़ी में मैं आपको एक पुरानी घटना सुनाता हूँ। इस श्रृँखला को कोई भी आगे बढ़ा सकता है। (सागर भाई सुन रहे हैं ना)
एक बार पंडित जी और कविराज बातें कर रहे थे। पंडित जी – अरे यार पता है एक बार मैं जब घनघोर जंगल से जा रहा था तो मुझे डाकुओं ने घेर लिया और मेरी घडी़, चेन, बटुआ सब लूट लिया। कविराज – लेकिन आपके पास पिस्तौल भी तो थी। पंडित जी – हाँ लेकिन शुक्र है उस पर उनकी नजर नहीं पड़ी।
कविराज – अब मेरी सुनो, एक बार मुझे भी रामगढ़ गाँव में डाकुओं ने घेर लिया। डाकुओं का सरदार गब्बर सिंह बोला – यहाँ से ५ मील…, जो कुछ है हमारे हवाले कर दो। कविराज – तुम मुझे जानते नहीं। गब्बर सिंह – कौन हो तुम। कविराज – यहाँ से १० मील दूर किसी गाँव में जब भी कोई बच्चा रोता है तो माँ कहती है बेटा सो जा, सो जा नहीं तो कविराज आ जाएगा। अब तुम यहाँ से खिसकते हो या कविता सुनानी शुरु करुँ…
कहते हैं डाकू गब्बर सिंह दुबारा रामगढ़ में नहीं दिखाई दिया। ![]()






